
✍️नवनीत मिश्रा
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” भारत का वह उद्घोष है जिसने पूरे विश्व को श्रेष्ठता की राह दिखाई। यह उद्घोष केवल शब्द नहीं था, बल्कि उस शिक्षा परंपरा का प्रतीक था जिसने भारत को पाणिनि, सुश्रुत, चरक, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य जैसे महापुरुष दिए। उन्होंने अपने गुरुकुल को मात्र शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि स्वाभिमान और साधना का तीर्थ माना। इसी कारण भारत की प्राचीनता ने आधुनिकता का पोषण किया और दुनिया को बौद्धिक समृद्धि का मार्ग दिखाया।
किसी भी राष्ट्र की असली सम्पन्नता उसकी बौद्धिक संपदा होती है और इस संपदा की जननी हमारे विद्यालय और हमारे गुरु हैं। इसी भावना को केंद्र में रखते हुए राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश ने 1 सितम्बर को “हमारा विद्यालय–हमारा स्वाभिमान” अभियान का आयोजन तय किया है। यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बच्चों और शिक्षकों के मन में विद्यालय के प्रति आत्मीयता और गौरव का भाव जगाने का प्रयास है।
इस अभियान का उद्देश्य विद्यालय को स्वच्छ, अनुशासित, हरित और प्रेरणादायी स्थल के रूप में स्थापित करना है। यह केवल भौतिक सौंदर्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस भावनात्मक जुड़ाव का भी, जो विद्यार्थियों को विद्या रूपी शक्ति अर्जित करने और आत्मबल से ओतप्रोत होने की ओर प्रेरित करता है। शक्तिबोध और सौंदर्यबोध– यही दो स्तंभ हैं जिन पर यह अभियान खड़ा है।
विद्यालय को राष्ट्रधन मानते हुए उसकी संपत्ति और संसाधनों का संरक्षण, शिक्षा को चरित्र निर्माण और समाज सेवा का माध्यम बनाना, भेदभाव रहित वातावरण तैयार करना और विद्यालय को संस्कार तथा समर्पण का तीर्थ मानना, यही संकल्प इस अवसर पर दोहराए जाएंगे। यह सत्य है कि किसी विद्यालय का कायाकल्प एक दिन में संभव नहीं, किंतु संकल्प की यह पहल परिवर्तन की दिशा में पहला कदम अवश्य है।
अभियान का उद्घोष है, “हमारा विद्यालय–हमारा तीर्थ है, हमारी आत्मा का अभिमान है और राष्ट्र निर्माण का आधार है।” यह उद्घोष केवल शिक्षकों का नहीं, बल्कि उन बच्चों का भी है जिनके बिना विद्यालय का अस्तित्व अधूरा है। यही संकल्प भविष्य के भारत को नई दिशा देगा और शिक्षा को उसके वास्तविक उद्देश्य, राष्ट्र निर्माण से जोड़कर खड़ा करेगा।