रूस-भारत रणनीतिक साझेदारी: नई आर्थिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दिशा

पुतिन की भारत-यात्रा: मोदी के साथ 25 वर्षों से चली आ रही दोस्ती को मिलेगी फिर से नई ताकत

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)व्लादिमीर पुतिन की द्विदिवसीय राजकीय भारत-यात्रा और 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन का आगाज़ एक ऐसे दौर में हो रहा है, जब भारत-रूस के रिश्तों में नई दिशा खोजने का समय है। 2001 में — जब नरेंद्र मोदी तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री थे — पहली बार मास्को की यात्रा के दौरान स्थापित हुई यह मित्रता आज लगभग 25 साल पूरे करती है। वर्तमान दौर में दोनों देशों के बीच ‘विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ को फिर से मजबूती देने का अवसर बन गया है।

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रूस-भारत नेतृत्व की इस मुलाकात का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा, आर्थिक — वैज्ञानिक — तकनीकी — सांस्कृतिक सहयोग को नए आयाम देना, तथा साझा वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श करना है। पुतिन की यह पहली भारत-यात्रा 2022 में यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद हो रही है; पिछली बार उन्होंने दिसंबर 2021 में भारत का दौरा किया था।

पिछली बार दोनों नेताओं की मुलाकात इस वर्ष 1 सितंबर को चीन के तियानजिन में हुए SCO शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। उस दौरान मोदी और पुतिन रूसी राष्ट्रपति की कार में बैठकर ही अपनी द्विपक्षीय वार्ता स्थल तक गए थे — एक प्रतीकात्मक पहल जो उनकी गहरी साझेदारी और सहयोग की भावना को दर्शाती है। उस वार्ता में मोदी ने जोर देकर कहा था कि वर्तमान वैश्विक खाद्य, उर्वरक और ईंधन संकट को देखते हुए युद्ध का समय नहीं है।

भारत-रूस भागीदारी अब सिर्फ पारंपरिक रक्षा या ऊर्जा सीमाओं में सीमित नहीं है। इस यात्रा के दौरान दस अंतर-सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की तैयारी है, साथ ही वाणिज्यिक और गैर-वाणिज्यिक संस्थाओं के बीच 15 से अधिक समझौते और ज्ञापन किए जाने की उम्मीद है। इनमें ऊर्जा, कृषि, उर्वरक, सूचना प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान प्रमुख होंगे।

यह शिखर सम्मेलन दोनों पक्षों को साझा आर्थिक विकास, वैज्ञानिक नवाचार और सामाजिक सद्भावना के लिए नई संभावनाएँ तलाशने का मंच देगा। विशेष रूप से उन वैश्विक चुनौतियों — जैसे खाद्य सुरक्षा, उर्वरक व ईंधन की अस्थिरता, तथा भू-राजनीतिक तनाव — को ध्यान में रखते हुए सहयोग और रणनीति तय की जाएगी।

पुतिन की यात्रा को सिर्फ एक औपचारिक दौरा न मानकर, इसे भारत-रूस रिश्तों के नवजागरण के रूप में देखना चाहिए। उस 2001-वाली दोस्ती को आज दो मजबूत लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच विश्वास, संवाद और साझेदारी का प्रतीक बनाना समय की मांग है।

भारत और रूस — सिर्फ द्विपक्षीय शक्ति नहीं, बल्कि एक साझा दृष्टिकोण, साझा सुरक्षा और साझा विकास की नींव के साथी बन सकते हैं। पुतिन-मोदी की यह मुलाकात उन्हें उस राह पर ला सकती है, जो न सिर्फ भारत और रूस बल्कि एक व्यापक वैश्विक स्थिरता, समृद्धि व सहयोग की दिशा में हो।

Editor CP pandey

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