सोमनाथ मिश्र की रिपोर्ट
आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया हमारी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। परिवार हो या दोस्ती, प्रेम संबंध हों या सामाजिक जुड़ाव—हर रिश्ते पर इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया हमारे रिश्तों को मजबूत कर रहा है या कहीं हम रिश्तों को स्क्रीन की भीड़ में खोते जा रहे हैं?
सोशल मीडिया और रिश्तों का नया समीकरण
तकनीक ने संवाद को तेज़ बनाया है, लेकिन मनों के बीच दूरी भी बढ़ाई है।
आज लोग एक ही छत के नीचे रहते हैं, पर वास्तविक बातचीत पिछड़ रही है। मोबाइल की स्क्रीन पर घंटों स्क्रोल करते हुए परिवारों का साथ कम होता जा रहा है। कहीं पर लाइक और कमेंट रिश्तों की वैल्यू तय करने लगते हैं।
- एक ही घर में दूरियों का बढ़ना
परिवार के सदस्य साथ बैठते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज्यादा होता है।
● खाने की टेबल पर मोबाइल
● बातचीत में नोटिफिकेशन की बाधा
● आराम का समय भी ऑनलाइन स्क्रोलिंग में बीतना
धीरे-धीरे भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होने लगता है और रिश्तों में “साथ होने के बावजूद अकेलेपन” का एहसास पनपने लगता है। - तुलना, ईर्ष्या और असुरक्षा की नई दुनिया
सोशल मीडिया पर सब कुछ परफेक्ट दिखाई देता है—खुशियाँ, पार्टी, घूमना-फिरना, रिश्ते…
लेकिन यह “परफेक्ट लाइफ” अक्सर भ्रम होती है।
यही तुलना रिश्तों में—
● असुरक्षा
● गलतफहमियाँ
● अविश्वास
● आत्मविश्वास में कमी
जैसी समस्याएँ पैदा कर देती है। असली जीवन धीरे-धीरे आभासी छवि से प्रभावित होने लगता है। - भावनाओं की जगह इमोजी
जहाँ पहले लोग घंटों चिट्ठियाँ लिखते थे, वहीं आज “❤️🙂👍” जैसे इमोजी भावनाओं का माध्यम बन गए हैं।
इमोजी संवाद आसान बनाते हैं, पर कई बार भावनाओं की गहराई को सीमित कर देते हैं।
सोशल मीडिया के सकारात्मक पहलू
सोशल मीडिया सिर्फ तनाव नहीं बढ़ाता, कई बार रिश्तों को मजबूत भी करता है—
● दूर के रिश्तेदारों से लगातार संपर्क
● पुरानी दोस्ती फिर से जोड़ना
● जरूरत पड़ने पर भावनात्मक सपोर्ट
● विशेष दिनों पर शुभकामनाओं से जुड़ाव बढ़ना
● रिश्तों को मैनेज करने के नए तरीके
यदि इसका सही इस्तेमाल किया जाए तो यह दूरी नहीं, बल्कि नजदीकियाँ बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।
सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव
गलत उपयोग या अत्यधिक समय देने पर इसके नुकसान भी गंभीर हो सकते हैं—
● परिवार में संवाद कम होना
● रिश्तों में अविश्वास और प्राइवेसी पर शक
● मानसिक दबाव: हमेशा ऑनलाइन रहने की मजबूरी
● हर किसी की तुलना करने की आदत
● भावनात्मक तनाव और असंतोष
जब स्क्रीन का उपयोग सीमा से बाहर हो जाए, तब रिश्तों की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है।
कैसे बनाएं डिजिटल बैलेंस? - परिवार में “नो-फोन टाइम” तय करें
रात का खाना या परिवार का समय बिना मोबाइल बिताएँ। - बातचीत को प्राथमिकता दें, चैट को नहीं
सामने बैठकर बात करने का कोई विकल्प नहीं है। - तुलना से बचें
जो सोशल मीडिया पर दिखाई देता है, वह हमेशा सच नहीं होता। - समय प्रबंधन सीखें
स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करें, अनावश्यक स्क्रोलिंग रोकें। - रिश्तों को समय दें
फोन से ज्यादा इंसान महत्त्वपूर्ण हैं—इसे जीवन में लागू करें।
रिश्ते तकनीक से नहीं, व्यवहार से बनते हैं
सोशल मीडिया न तो पूरी तरह गलत है और न पूरी तरह सही।
यह हमें जोड़ भी सकता है और दूर भी कर सकता है—निर्णय हमारे हाथों में है।
यदि हम डिजिटल दुनिया को जीवन का सहारा बनाएँ, सहारा नहीं—तो रिश्ते मजबूत रहेंगे। वही स्क्रीन जो दूरी बढ़ाती है, सही उपयोग से नजदीकियाँ भी बढ़ा सकती है।
