“साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसकी मशाल भी है।” यह कथन प्रेमचंद के साहित्यिक अवदान पर अक्षरशः खरा उतरता है। युगों-युगों तक पढ़े जाने वाले साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद न केवल हिन्दी साहित्य के युगप्रवर्तक रचनाकार रहे, बल्कि समाज की पीड़ा, विडंबना और आशा को शब्दों में ढालने वाले संवेदनशील कलमकार भी रहे। प्रेमचंद की जयंती (31 जुलाई) की पूर्व संध्या पर उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल, ख्यात साहित्यकार और ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पूरी तरह प्रासंगिक है।
डाक-परिवार से प्रेमचंद का जुड़ाव
मुंशी प्रेमचंद का जन्म लमही (वाराणसी) में हुआ था, और उनके पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी (क्लर्क) थे। ऐसे में उनका डाक विभाग से आत्मीय रिश्ता भी रहा। इस ऐतिहासिक जुड़ाव का उल्लेख करते हुए श्री यादव ने बताया कि, “प्रेमचंद की जन्मशती पर भारतीय डाक विभाग ने 30 जुलाई 1980 को उनके सम्मान में 30 पैसे मूल्य का डाक टिकट जारी किया था।” यह न केवल उनकी साहित्यिक महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि डाक विभाग के सांस्कृतिक योगदान को भी दर्शाता है।
प्रेमचंद युग : आदर्श से यथार्थ की ओर 1918 से 1936 तक का समय हिन्दी साहित्य में ‘प्रेमचंद युग’ के नाम से जाना जाता है। श्री यादव ने स्पष्ट किया कि प्रेमचंद का साहित्य आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर संक्रमण की चेतना को अभिव्यक्त करता है। उन्होंने अपने पात्रों – होरी, धनिया, अमीना, माधो, जियावन, हामिद – के माध्यम से समाज के उपेक्षित और पीड़ित वर्ग को स्वर दिया।
“प्रेमचंद का लेखन समाज के निचले तबके की पीड़ा, शोषण और संघर्ष की सच्ची तस्वीर है,” श्री यादव ने कहा। उन्होंने आगे जोड़ा, “प्रेमचंद ने साहित्य को यथार्थ के धरातल पर उतारा और लेखनी के ज़रिए सामाजिक चेतना की मशाल जलाई।”
प्रेमचंद : केवल कथाकार नहीं, जन-जागरण के सेनानी प्रेमचंद एक कथाकार होने के साथ-साथ पत्रकार, शिक्षक और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े एक विचारक भी थे। उनके लेखन में ब्रिटिश राज, सामाजिक भेदभाव, ग्रामीण जीवन की त्रासदी, जातिगत शोषण और स्त्री-विमर्श जैसे विषय गहराई से उभरते हैं। उन्होंने किसी वाद या विचारधारा से नहीं, जनसरोकारों और सामाजिक सच्चाइयों से अपने साहित्य को जोड़ा।
कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि, “जब प्रेमचंद अपनी रचनाओं में समाज के उपेक्षित वर्ग को प्रतिनिधित्व देते हैं, तो वह केवल साहित्य रचने का कार्य नहीं कर रहे होते, बल्कि एक संघर्ष की बुनियाद रख रहे होते हैं।”
ग्लोबल दौर में भी प्रेमचंद की प्रासंगिकता भूमंडलीकरण, उपभोक्तावाद और सामाजिक विघटन के इस दौर में भी प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता कम नहीं हुई, बल्कि और भी बढ़ी है। श्री यादव ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्यिक और सामाजिक विमर्श आज की पीढ़ी के लिए संवेदनशीलता, न्याय और सामाजिक समानता का बुनियादी पाठ पढ़ाने का कार्य करते हैं।
“प्रेमचंद के पात्र आज भी हमारे आसपास हैं – खेतों में, झुग्गियों में, सड़कों पर और अदालतों के गलियारों में। वे हमारे भीतर की संवेदना को जगाते हैं और सवाल खड़े करते हैं,” श्री यादव ने कहा।
प्रेमचंद की लेखनी अमर है – प्रेमचंद का साहित्य शाश्वत है – वह न केवल अतीत का दर्पण है, बल्कि वर्तमान का मार्गदर्शक और भविष्य का संकेतक भी है। श्री कृष्ण कुमार यादव की यह टिप्पणी हमें प्रेमचंद की उस सामाजिक दृष्टि से जोड़ती है, जो आज भी समान रूप से प्रेरक और चेतनादायक है।
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