नीति निपुण लोगों को निंदा और
प्रशंसा दोनो ही हितकारी लगते हैं,
वह सदा शान्ति और धैर्य रखते हैं,
वे विचलित नहीं न्यायपथ से होते हैं।
सराहना व निंदा दोनों अच्छे होते हैं,
क्योंकि सराहना हमें प्रेरणा देती है,
और निन्दा हमें सावधान करती है,
सतर्कता व सुरक्षा तभी मिलती हैं।
क़र्म धन, धर्म धन और विचार धन,
शरीर के साथ संसार में छूट जाते हैं,
आत्मा अनित्य, शरीर नश्वर होता है,
आत्मा के साथ कुछ भी नहीं जाता है।
अंधकार में छाया, बुढ़ापे में काया
और अंत समय में माया कभी भी
किसी का भी साथ नहीं दे पाते हैं,
लोग कितना भी प्रयत्न कर लेते हैं।
आदित्य खुशियों के लिये बहुत कुछ
करना पड़ता है ऐसा लोग समझते हैं,
हकीकत में खुशी के लिए बहुत कुछ
खोना पड़ता है, यह अनुभव कहता है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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