दीपावली मे मिट्टी के दीयों से रोशनी करने की सदियों पुरानी परम्परा मे जुटे कुम्हार

बढती मांग और सरकार की पहलसे शुरु हुआ कारोबार

डॉ सतीश पाण्डेय व नीरज मिश्र की रिपोर्ट

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा )।दीपों के पर्व दीपावली के नजदीक आने के साथ ही कुम्हारों के उम्मीद की चाक चल पड़ी है। इस पर्व पर मिट्टी के दीयों से रोशनी करने की परम्परा सदियों पुरानी है। ऐसे में दीपावली के नजदीक आते ही कुम्हार संजय प्रजापति व बलराम प्रजापति ने दीया
बनाने के काम में तेजी से जुट गए हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार उनकी दीवाली भी रोशन रहेगी। दीपावली का त्योहार करीब आ गया है। पौराणिक मान्यता है कि लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या वापस लौटे तो नगरवासियों ने उनके स्वागत में घर-घर में दीप जलाएं, तभी से दीपावली के पर्व का आगाज हुआ। दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। हालांकि आधुनिकता के इस दौर में दीयों का स्थान बिजली के झालरों ने ले लिया था, लेकिन सरकार ने मोबाइल पर चीनी एप प्रतिबंधित कर दिया। देश के शहीद जवानों के सम्मान मे भारतवासियों ने चीनी सामानों का भी बहिष्कार किया और स्वदेशी पर जोर दिया। चीनी सामानों से दूरी बनाने के बाद इस साल दीपावली पर कुम्हारों के मंद पड़े चाकों ने अर्से बाद रफ्तार पकड़ ली है और इस बार मिट्टी के दीयों से दशकों पूर्व की पारम्परिक दीपावली देखने को मिल सकती है।
रोजगार बंद होने के बाद सरकार की प्रोत्साहन के वजह से एक बार फिर उम्मीद से कुम्हारों ने अपने हुनर से मिट्टी के दीये को डिजाइन देना शुरु कर दिये है और मिट्टी के दीये की जगह मोमबत्ती और झालर ने ले लिया है। देश में चाइना के बने झालरों की भरमार के बाद लोग रंग-बिरंगे झालर दीपावली पर घरों में लगा तो रहे थे। वर्ष भर इस त्योहार की प्रतीक्षा करने वाले कुम्हारों की दीपावली अब पहले की तरह रोशन नहीं रही। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से स्वदेशी निर्मित उत्पादों के प्रयोग को लेकर कई स्वयंसेवी संगठन खड़े हुए हैं। इसका असर भी दिखाई पड़ा है। इसी उम्मीद में कुम्हारों के चाक फिर से चल पड़े हैं। उन्हें उम्मीद है कि एक बार फिर से उनके अच्छे दिन लौटकर आएंगे।

rkpnews@desk

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