देवी की पूजा से बेटी के अधिकार तक: पितृसत्ता पर उठे सवाल ने छेड़ी राष्ट्रीय बहस

नारी शक्ति के लिए कानूनों का कवच, फिर भी पितृसत्ता की जड़ें क्यों मजबूत? संसद, सरकार, न्यायपालिका और समाज की भूमिका पर व्यापक विश्लेषण

गोंदिया, महाराष्ट्र। भारत की सांस्कृतिक पहचान में नारी को शक्ति, सृजन और मातृत्व के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। मां दुर्गा, काली और शक्ति के विविध स्वरूपों की आराधना इसका उदाहरण हैं। लेकिन इसी सांस्कृतिक धरातल पर एक विरोधाभास भी दिखाई देता है। एक ओर नारी को देवी मानने की परंपरा है, तो दूसरी ओर परिवार, संपत्ति, निर्णय, सामाजिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में पुरुष-प्रधान सोच की मौजूदगी दिखाई देती है।
यही सवाल 29 सितंबर 2026 को फिर राष्ट्रीय विमर्श में सामने आया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चल रहे छात्र आंदोलनों का समर्थन करते हुए पितृसत्तात्मक सोच पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि महिलाओं के खिलाफ अपराध होने पर समाधान उनकी स्वतंत्रता अथवा आवाजाही सीमित करना नहीं होना चाहिए।
आधुनिक भारत ने संविधान, संसद, सरकार और न्यायपालिका के माध्यम से लैंगिक समानता की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। संविधान का समानता सिद्धांत, बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देने वाला हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम-2005, घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम-2005, दहेज प्रतिषेध अधिनियम-1961, कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण संबंधी 2013 का कानून और नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 के संशोधन ने बेटी को पुत्र की तरह जन्म से सहदायिकी संपत्ति में समान अधिकार प्रदान किया। यह बदलाव केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि संपत्ति और आर्थिक निर्णयों में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी
भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने भी महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की दिशा में संवैधानिक कदम उठाया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम अर्थात संविधान का 106वां संशोधन अधिनियम-2023 लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है। हालांकि इसका वास्तविक क्रियान्वयन संबंधित जनगणना के प्रकाशन और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन के बाद होना है।
पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी भी व्यापक हुई है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की बड़ी संख्या यह बताती है कि स्थानीय शासन में महिलाओं की औपचारिक राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ी है। लेकिन प्रतिनिधित्व के साथ वास्तविक निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
योजनाओं ने बढ़ाया महिला सशक्तिकरण का दायरा
महिला सशक्तिकरण केवल कानूनों तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक भागीदारी को बढ़ाना है।
मिशन शक्ति के अंतर्गत संबल में वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और नारी अदालत जैसी पहलें शामिल हैं। वहीं समर्थ्य के अंतर्गत महिला सशक्तिकरण से जुड़े कार्यक्रमों को समाहित किया गया है।
प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत पात्र गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पहले जीवित बच्चे के लिए 5,000 रुपये तथा दूसरी संतान लड़की होने पर 6,000 रुपये की सहायता का प्रावधान है। अगस्त 2026 तक देश में 991 कार्यरत वन स्टॉप सेंटरों के माध्यम से 15.20 लाख से अधिक महिलाओं को सहायता मिलने की जानकारी सरकार की ओर से दी गई है।
सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और महिलाओं के नाम आवास आवंटन जैसी पहलें भी महिला-केंद्रित नीतियों का हिस्सा हैं।
कानून और सामाजिक व्यवहार में अंतर
लेकिन कानून में समानता और सामाजिक व्यवहार में समानता एक ही बात नहीं है। यहीं पितृसत्ता का प्रश्न सामने आता है।
‘पैट्रियार्की’ शब्द की जड़ यूनानी अवधारणाओं ‘पैटर’ यानी पिता और ‘आर्के’ यानी शासन से जुड़ी मानी जाती है। आधुनिक सामाजिक अर्थ में पितृसत्ता ऐसी संरचना को कहा जाता है जिसमें परिवार, संपत्ति, आर्थिक संसाधनों और सामाजिक-सार्वजनिक निर्णयों पर पुरुषों का अनुपातहीन नियंत्रण हो सकता है और महिलाओं की भूमिका अपेक्षाकृत गौण हो सकती है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक परिवार, पुरुष या सामाजिक परंपरा अनिवार्य रूप से दमनकारी है। यह अवधारणा उन संरचनात्मक प्रवृत्तियों का वर्णन करती है जिनमें लिंग के आधार पर अधिकार और अवसरों में असमानता पैदा हो सकती है।
पितृसत्ता का प्रभाव संपत्ति और आर्थिक निर्भरता से लेकर श्रम-विभाजन, विवाह, महिला की स्वतंत्र आवाजाही, यौनिकता और प्रजनन संबंधी निर्णयों तक दिखाई दे सकता है। कई समाजों में परिवार का नाम पिता से चलना, विवाह के बाद महिला द्वारा पति का उपनाम अपनाना अथवा घरेलू निर्णयों में पुरुष को अंतिम निर्णायक मानना इसी व्यापक सामाजिक विमर्श का हिस्सा माना जाता है।
हालांकि प्रत्येक व्यक्तिगत सामाजिक प्रथा को स्वतः कानूनी अपराध नहीं कहा जा सकता। संवैधानिक और कानूनी हस्तक्षेप वहां अधिक स्पष्ट होता है, जहां कोई व्यवहार भेदभाव, हिंसा, जबरदस्ती अथवा मौलिक या वैधानिक अधिकारों के उल्लंघन में बदल जाता है।
महिला सुरक्षा और स्वतंत्रता पर बहस
29 सितंबर 2026 का राजनीतिक विमर्श दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की से कथित सामूहिक बलात्कार, बिहार के जमुई में नाबालिगों के कथित उत्पीड़न और महिला सुरक्षा को लेकर हो रहे प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में सामने आया।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नेता प्रतिपक्ष ने सरकार की आलोचना करते हुए महिलाओं को अपराधों के लिए दंडित करने अथवा उनकी स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने की मानसिकता पर सवाल उठाया। यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप और दृष्टिकोण है, जिसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।
जमुई मामले में एक नाबालिग लड़की और उसके साथी के कथित उत्पीड़न से संबंधित वीडियो सामने आने के बाद विवाद हुआ और आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत कार्रवाई की गई। वहीं दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज प्रकरण में 17 वर्षीय लड़की ने तीन व्यक्तियों पर सामूहिक बलात्कार का आरोप लगाया, जिसके बाद महिला सुरक्षा को लेकर विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किए।
इन घटनाओं ने एक मूल सवाल को फिर सामने ला दिया है—महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रता और आवाजाही को सीमित किया जाए या अपराधियों की जवाबदेही और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर अधिक जोर दिया जाए?
वैश्विक स्तर पर भी गंभीर चुनौती
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में लगभग तीन में से एक महिला अपने जीवनकाल में अंतरंग साथी द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा अथवा गैर-साथी द्वारा यौन हिंसा का अनुभव कर चुकी है। लैंगिक असमानता को महिला हिंसा की महत्वपूर्ण सामाजिक जड़ों में माना जाता है।
इसलिए पीड़िता से यह पूछना कि वह कहां गई थी, क्या पहन रखा था या किस समय बाहर थी, कई परिस्थितियों में अपराधी की जवाबदेही से ध्यान हटाकर पीड़िता को दोष देने वाली मानसिकता को बढ़ावा दे सकता है। महिला सुरक्षा की चर्चा में यह अंतर समझना आवश्यक है कि सावधानी और प्रतिबंध में फर्क होता है।
न्यायपालिका ने भी खोले समानता के रास्ते
लैंगिक समानता के प्रश्न पर न्यायपालिका के कई फैसले महत्वपूर्ण रहे हैं। मदुरै जिले के नल्लुथेवनपट्टी स्थित दुर्गा मंदिर में पिन्नियक्कल ने अपने पिता की मृत्यु के बाद वंशानुगत पुजारी पद पर दावा किया था। मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति के. चंद्रू ने 2008 में उनके पक्ष में निर्णय देते हुए लैंगिक पूर्वाग्रह से मुक्त धार्मिक व्यवस्था की संवैधानिक भावना पर जोर दिया।
इसी क्रम में 2018 का सबरीमाला फैसला भी महत्वपूर्ण रहा। पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 बहुमत से 10 से 50 वर्ष आयु की महिलाओं के मंदिर प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक माना। बहुमत ने अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक आस्था और उपासना की स्वतंत्रता महिलाओं को भी उपलब्ध होने तथा महिलाओं के बहिष्कार को आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्ध न होने की बात कही।
हालांकि न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने असहमति व्यक्त करते हुए धार्मिक समुदाय की स्वायत्तता और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को लेकर अलग दृष्टिकोण रखा। इस प्रकार यह फैसला समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन की बहस का महत्वपूर्ण उदाहरण भी है।
आरक्षण के साथ वास्तविक निर्णय क्षमता भी जरूरी
राजनीतिक प्रतिनिधित्व में केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के स्थान पर पति या पुरुष रिश्तेदार द्वारा वास्तविक सत्ता चलाने की शिकायतें लंबे समय से ‘सरपंच-पति’ अथवा प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व की समस्या के रूप में सामने आती रही हैं।
केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में संसद को बताया कि पंचायत स्थानीय शासन का राज्य विषय है और निर्वाचित महिलाओं की स्वतंत्र निर्णय क्षमता से जुड़ी कार्रवाई मुख्यतः राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आती है। साथ ही राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान के तहत निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को समर्थन दिया जा रहा है।
इससे स्पष्ट होता है कि राजनीतिक आरक्षण के साथ प्रशिक्षण, प्रशासनिक समझ और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता भी महिला प्रतिनिधित्व की प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण है।
समाधान केवल नया कानून नहीं
पितृसत्ता को समाप्त करने के लिए ऐसा कोई एक दंड कानून बनाना आसान नहीं है, जो हर पारिवारिक और सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित कर सके। अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण यह हो सकता है कि जहां पितृसत्तात्मक व्यवहार हिंसा, दहेज, घरेलू उत्पीड़न, यौन अपराध, संपत्ति से वंचित करने या कार्यस्थल पर उत्पीड़न में बदलता है, वहां मौजूदा कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
वहीं गैर-अपराधिक सामाजिक पूर्वाग्रहों को शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, बाल्यावस्था से लैंगिक संवेदनशीलता, पुरुषों और लड़कों की भागीदारी तथा जन-जागरूकता के माध्यम से चुनौती देने की आवश्यकता है।
यौन अपराधों के मामलों में पीड़ित-केंद्रित जांच, पर्याप्त विशेष एवं त्वरित अदालतें, समयबद्ध फॉरेंसिक जांच और गवाह सुरक्षा जैसे उपाय भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत के सामने चुनौती केवल कानूनों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता को सामाजिक व्यवहार में उतारने की है। देवी की आराधना और बेटी की वास्तविक स्वतंत्रता के बीच यदि अंतर बना रहता है तो महिला सशक्तिकरण अधूरा रहेगा।
सरकार कानून बना सकती है, पुलिस अपराधों की जांच और रोकथाम कर सकती है, न्यायपालिका अधिकारों की रक्षा कर सकती है और संसद राजनीतिक प्रतिनिधित्व के रास्ते खोल सकती है। लेकिन घर, विद्यालय, समुदाय और सामाजिक संस्कारों में स्त्री को स्वतंत्र निर्णयकर्ता मानने की मानसिकता समाज को स्वयं विकसित करनी होगी।
नारी सशक्तिकरण का अगला चरण केवल ‘महिला की सुरक्षा’ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी स्वतंत्रता, गरिमा, समान अवसर और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति सुनिश्चित करने से जुड़ा होना चाहिए।
विशेषज्ञ स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (एटीसी), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र।

Editor CP pandey

Recent Posts

बिहार में मौसम का दोहरा असर! मानसून पड़ा कमजोर, फिर भी 17 जिलों में बाढ़ का खतरा

सांकेतिक पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार में मानसून अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा है…

3 minutes ago

धनुष से निकला गोल्ड का निशाना! चीन को पछाड़कर भारतीय तीरंदाजों ने रचा बड़ा कारनामा

भारत की बेटियों का तीरंदाजी में कमाल, चीन को पछाड़कर जीता गोल्ड; परफेक्ट-10 से वर्ल्ड…

13 minutes ago

इंदौर प्रेस क्लब में सजा सम्मान समारोह, डॉ. जयंतीलाल भंडारी हुए हरिहर लहरी सम्मान से सम्मानित

इंदौर (राष्ट्र की परम्परा)। देश के ख्यात शिक्षाविद एवं अर्थशास्त्री डॉ. जयंतीलाल भंडारी को वर्ष…

56 minutes ago

युद्धों का असर अब थाली तक! जयशंकर बोले- आने वाले महीनों में मंडरा सकता है बड़ा खाद्य संकट

न्यूयॉर्क (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूक्रेन और ईरान-खाड़ी क्षेत्र में…

1 hour ago

धूल, कचरा और प्रदूषण पर दिल्ली सरकार का बड़ा दांव, छोटी सड़कों तक पहुंचेगी मशीनों से सफाई

दिल्ली में प्रदूषण पर सरकार का बड़ा प्लान, 30 ईवी रोड स्वीपर खरीदने को मंजूरी;…

1 hour ago

देवरिया की बेटी भावना को डीएम ने दी बड़ी शुभकामना, जापान में तिरंगा लहराने का बढ़ा हौसला

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। जापान में अक्टूबर 2026 में आयोजित होने वाले पैरा एशियन गेम्स…

10 hours ago