प्रदेश की राजनीति इन दिनों पोस्टरों से पटी पड़ी है। ऐसा लगता है जैसे सड़क के किनारे लगे रंगीन कागज़ ही लोकतंत्र का आईना बन गए हों। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही जनता को गुमराह करने और एक-दूसरे पर तंज कसने का नया मैदान पोस्टरों को बना चुके हैं। सवाल है, क्या इसी को राजनीति कहा जाएगा?
समाजवादी पार्टी के एक नेता का ताज़ा पोस्टर भाजपा पर करारा हमला बोलता है— “कभी टोपी, कभी गंगाजल, कभी चालान का बहाना… इनकी सियासत बस झूठ का फ़साना।” पोस्टर में किसानों की खाद की समस्या, छात्रों की सड़क पर बेइज़्ज़ती और अखिलेश यादव को “केवल उम्मीद” बताकर 2027 में PDA सरकार लाने का दावा किया गया है। यह निश्चित रूप से भाजपा को चुनौती है, लेकिन क्या इस चुनौती में ठोस समाधान छिपा है?
दरअसल, पोस्टरवार की राजनीति नेताओं की कमजोरी उजागर करती है। जब जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएँ सुनने और हल करने का साहस न हो, तब पोस्टरों का सहारा लिया जाता है। पोस्टर सच्चाई का आईना नहीं, बल्कि सियासी जुमलों का चश्मा हैं, जो जनता की आँखों पर चढ़ा दिया जाता है।
आज किसान खाद, बिजली और न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए संघर्ष कर रहा है। छात्र रोजगार और सुरक्षित भविष्य की तलाश में ठोकरें खा रहे हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था बदहाल है। लेकिन नेताओं के लिए यह मुद्दे ज़मीन पर लड़ने लायक नहीं रहे। उनकी लड़ाई अब दीवारों पर चिपके नारों तक सीमित हो गई है।
2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी आहट पहले से सुनाई देने लगी है। विपक्ष भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है और भाजपा इन आरोपों को नकारने में जुटी है। लेकिन यह पूरा खेल जनता की पीड़ा को हाशिये पर धकेल देता है। सत्ताधारी दल से अपेक्षा है कि वह ठोस कामों से जवाब दे, और विपक्ष से अपेक्षा है कि वह केवल तुकबंदियों में नहीं, बल्कि ठोस वैकल्पिक नीतियों में भरोसा दिखाए।
लोकतंत्र नारों और पोस्टरों से नहीं चलता। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—जनता अब केवल तंज और जुमलों से बहलने वाली नहीं। यदि राजनीति पोस्टर चिपकाने तक ही सीमित रह गई, तो यह लोकतंत्र का मज़ाक बनकर रह जाएगा। अब समय है कि नेता पोस्टरों से निकलकर सड़कों और खेतों में उतरें, जहाँ असली भारत उम्मीद लगाए बैठा है।
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