दही-चूड़ा की थाली पर सियासत: विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में रिश्तों की नई राजनीति

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद पहली बार मकर संक्रांति के मौके पर आयोजित दही-चूड़ा भोज ने राजनीति को नई दिशा और नया संदेश दिया है। यह आयोजन अब केवल पारंपरिक सामाजिक रस्म नहीं रह गया, बल्कि सत्ता, विपक्ष और भविष्य की रणनीतियों का संकेतक बन चुका है। अलग-अलग दलों के नेताओं की मौजूदगी, गैरहाजिरी और मेल-मुलाकात ने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति में संवाद और दूरी—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।

इस सियासी परिदृश्य में सबसे अधिक चर्चा राजद नेता तेजप्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज की रही। पार्टी की ओर से औपचारिक आयोजन न होने के बावजूद तेजप्रताप के निजी आयोजन ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। इस भोज में लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी को पार्टी के भीतर संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा गया। हालांकि राबड़ी देवी की अनुपस्थिति और तेजस्वी यादव की दूरी ने कई राजनीतिक अटकलों को जन्म दिया। दिलचस्प बात यह रही कि इस आयोजन में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा, जदयू मंत्री अशोक चौधरी और विधायक चेतन आनंद जैसे नेताओं की मौजूदगी ने संदेश को और बहुआयामी बना दिया।

वहीं दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा के आवास पर हुए दही-चूड़ा भोज को सत्ताधारी गठबंधन का शक्ति प्रदर्शन माना गया। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित भाजपा और जदयू के शीर्ष नेताओं की उपस्थिति ने एनडीए की एकजुटता का संकेत दिया। इसके बाद जदयू विधायक रत्नेश सदा के आयोजन में भी पार्टी नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी दिखी, जिससे गठबंधन के भीतर सामंजस्य का संदेश गया।

भाजपा कार्यालय में आयोजित भोज और नितिन नवीन के प्रस्तावित आयोजन को पार्टी के भीतर बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक माना जा रहा है। इन आयोजनों ने यह स्पष्ट किया कि भाजपा संगठनात्मक स्तर पर भी अपनी मजबूती दिखाने में जुटी है।

उधर, कांग्रेस का सदाकत आश्रम में आयोजित भोज चर्चा में तो रहा, लेकिन एक भी विधायक की गैरमौजूदगी ने पार्टी की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद कांग्रेस में टूट की अटकलें तेज हुईं, हालांकि नेतृत्व ने सार्वजनिक तौर पर इन चर्चाओं को खारिज किया।

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आज लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की ओर से आयोजित दही-चूड़ा भोज भी खास माना जा रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की मौजूदगी, साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत एनडीए के वरिष्ठ नेताओं को भेजे गए आमंत्रण, इस आयोजन को राजनीतिक रूप से अहम बनाते हैं। विधानसभा चुनाव में पार्टी के 19 विधायकों की जीत और सरकार में दो मंत्रियों की भागीदारी ने चिराग पासवान की राजनीतिक पकड़ को और मजबूत किया है।


इस सियासी भोज के दौर में दिवंगत सुशील मोदी के पारंपरिक दही-चूड़ा भोज और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव के आयोजन की कमी भी महसूस की गई। यह दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा भोज अब परंपरा के साथ-साथ पहचान भी बन चुका है।

कुल मिलाकर, इस बार दही-चूड़ा की थाली बिहार की राजनीति में संवाद, दूरी और संतुलन—तीनों का प्रतीक बनकर उभरी है। हर आयोजन ने अपने साथ एक अलग राजनीतिक संदेश दिया, जिससे साफ है कि ये भोज अब साधारण सामाजिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति का संकेतक मंच बन चुके हैं।

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Karan Pandey

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