किसी के साथ बुरा उतना ही करो,
कि खुद पे आए तो सहन कर सको,
बुरा ढूँढता हूँ, बुरा न मिलता कोय,
दिल देखूँ आपना मुझसे बुरा न कोय।
हमारी तमीज, तहजीब व अदब
जीवन में बहुत कुछ बोलती हैं,
कितना भी छिपाये इंसान पर,
शख्सियतें निशान छोड़ती हैं।
कहाँ मिलेंगे लोग मन मुताबिक,
ख़ुद को भी कुछ झुकना पड़ता है,
जिद की एक गाँठ जो छूट जाये,
उलझा हुआ रिश्ता सुलझ जाये।
जीवन में कलह का हल सुलह है,
अब करो या नुकसान होने के बाद,
आज के जमाने में बिना मतलब के
यहाँ तो कोई भी नहीं करता है बात।
बहुत उम्मीद न करना किसी से,
आदित्य लोग साथ कहाँ देते हैं,
जिससे जितना लगाव होता है,
वह तो सबसे गहरा घाव देते हैं।
डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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