✍️ सीमा त्रिपाठी (शिक्षिका, साहित्यकार एवं लेखिका)
बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। नववर्ष का आगमन आत्मचिंतन और संकल्प का अवसर लेकर आता है। वर्ष 2025 किसी के लिए खुशियां लाया तो किसी के लिए चुनौतियां। किसी को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाया तो किसी को संघर्ष की राह पर खड़ा कर दिया। लेकिन जीवन का सत्य यही है कि यह संसार कर्मभूमि है—जैसा कर्म, वैसा फल।
अब 2025 के बीते पलों पर विचार करने के बजाय 2026 को बेहतर बनाने का संकल्प लेने का समय है। नए साल में हम सबको अपनी सामर्थ्य के अनुसार अच्छे कर्मों की शुरुआत करनी चाहिए। जरूरतमंदों को कंबल, स्वेटर या भोजन उपलब्ध कराना, सड़कों पर घूमने वाली गायों के लिए चारा-पानी की व्यवस्था करना, असहाय व्यक्तियों को आश्रय देना—ऐसे छोटे-छोटे प्रयास भी जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
कहा जाता है कि मनुष्य के साथ अंततः उसका कर्म ही जाता है। कुकर्मों का दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां संस्कारवान और सुयोग्य बनें, तो आज से ही सत्कर्मों का मार्ग अपनाना होगा।
मीठी वाणी, आदरपूर्ण व्यवहार, बड़ों का सम्मान और आपसी सौहार्द—ये सभी गुण व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारते हैं और समाज में सकारात्मक वातावरण बनाते हैं। कुछ लोग अपने दुर्भाग्य को दोष देते हैं, जबकि सत्य यह है कि भाग्य का निर्माण कर्म से ही होता है। अच्छे कर्म से अच्छा भाग्य और बुरे कर्म से बुरा परिणाम निश्चित है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कर्म की महत्ता बताते हुए कहा है—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता किए बिना निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।
आइए, हम सभी मिलकर 2026 में अच्छे कर्म करने की शपथ लें और आपसी सद्भाव, भाईचारे व मानवीय मूल्यों की खुशबू से देश और समाज को सुगंधित करें।
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