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भारत में दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए सहायक उपकरणों की गुणवत्ता पर सख्ती, 1 मई 2026 से लागू हुए नए BIS मानक

दिव्यांगों के लिए सहायक उपकरणों की क्वालिटी में लापरवाही अब नहीं चलेगी, BIS के नए मानकों से बढ़ेगी सुरक्षा और सुलभता



समानता से सुलभता तक: वॉकिंग स्टिक, बैसाखी, ब्रेल साइनेज और व्हीलचेयर रैंप के लिए नए राष्ट्रीय मानक जारी


भारत तेजी से बदलते सामाजिक और जनसांख्यिकीय दौर से गुजर रहा है। एक ओर युवा शक्ति देश की आर्थिक ऊर्जा का आधार बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों की बढ़ती संख्या नई सामाजिक, स्वास्थ्य और नीतिगत चुनौतियों को सामने ला रही है। बढ़ती जीवन प्रत्याशा, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के कारण बुजुर्ग आबादी का दायरा लगातार बढ़ रहा है। साथ ही सड़क दुर्घटनाएं, औद्योगिक हादसे, जन्मजात विकृतियां और गंभीर बीमारियां भी दिव्यांगजनों की संख्या में वृद्धि का कारण बन रही हैं।
ऐसे समय में किसी भी संवेदनशील और प्रगतिशील राष्ट्र की जिम्मेदारी केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि समाज के कमजोर और विशेष आवश्यकता वाले वर्गों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सुलभ वातावरण तैयार करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है। इसी दिशा में भारत सरकार द्वारा “विकलांग” शब्द के स्थान पर “दिव्यांग” शब्द को अपनाना केवल भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण में परिवर्तन का प्रतीक माना गया।
इसी समावेशी सोच को आगे बढ़ाते हुए भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने 1 मई 2026 से बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए उपयोग होने वाले सहायक उपकरणों के लिए नए गुणवत्ता मानक जारी किए हैं। इनमें वॉकिंग स्टिक्स, बैसाखियां, व्हीलचेयर रैंप, ब्रेल साइनेज और टैक्टाइल गाइड मैप जैसे उपकरण शामिल हैं। यह पहल न केवल सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगी, बल्कि भारत को वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप भी स्थापित करेगी।
इन नए मानकों का आधार भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा तैयार राष्ट्रीय आवश्यक सहायक उत्पाद सूची (NLEAP) को बनाया गया है। यह सूची विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की उस अवधारणा से प्रेरित है, जिसमें सहायक उपकरणों को स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को केवल उपकरण उपलब्ध ही न हों, बल्कि वे सुरक्षित, टिकाऊ, आरामदायक और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के अनुरूप भी हों।
यदि वॉकिंग स्टिक यानी सहारा देने वाली छड़ी की बात करें, तो BIS ने इसके लिए IS 5145:2026 और IS 18558 (Part 4):2025 जैसे दो प्रमुख मानक तय किए हैं। IS 5145:2026 के तहत लकड़ी, बांस, एल्युमिनियम, प्लास्टिक और रबर से बनी छड़ियों की लंबाई, वजन, पकड़, मजबूती और टिकाऊपन से जुड़े विस्तृत दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं। इसका उद्देश्य उपयोगकर्ता को बेहतर संतुलन और सुरक्षा प्रदान करना है ताकि गिरने जैसी दुर्घटनाओं की संभावना कम हो सके।
वहीं IS 18558 (Part 4):2025 विशेष रूप से तीन या अधिक पैरों वाली वॉकिंग स्टिक्स के लिए तैयार किया गया है। यह उन वरिष्ठ नागरिकों और गंभीर रूप से दिव्यांग व्यक्तियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्हें अतिरिक्त स्थिरता की आवश्यकता होती है। इसमें हैंडल डिजाइन, रबर टिप की गुणवत्ता और प्रदर्शन परीक्षण जैसे पहलुओं को सख्ती से शामिल किया गया है।
इसी प्रकार एल्बो क्रच यानी कोहनी वाली बैसाखियों के लिए IS 18558 (Part 1):2025 मानक जारी किया गया है, जो ISO 11334-1 के अनुरूप है। इसमें ऊंचाई समायोजन, हैंडग्रिप की गुणवत्ता और शरीर पर दबाव कम करने जैसी बातों पर विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि लंबे समय तक उपयोग करने पर भी उपयोगकर्ता को असुविधा न हो।
सुलभता के व्यापक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए BIS ने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। IS 19189:2025 मानक टैक्टाइल गाइड मैप के डिजाइन और उपयोग से संबंधित है। यह रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, पार्क और सरकारी भवनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर दृष्टिबाधित लोगों को स्वतंत्र रूप से मार्ग खोजने में मदद करेगा। इसमें उभरे हुए संकेतों और स्पर्श आधारित टेक्सचर को स्पष्ट और उपयोगी बनाने के निर्देश दिए गए हैं।
इसी क्रम में IS 19190:2025 ब्रेल साइनेज के लिए दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इसमें ब्रेल अक्षरों के आकार, दूरी, सामग्री और उनके स्थान निर्धारण के स्पष्ट मानक तय किए गए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दृष्टिबाधित व्यक्ति बिना किसी सहायता के सार्वजनिक और व्यावसायिक स्थानों पर आवश्यक जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकें।
व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं और गतिशीलता सहायता की आवश्यकता वाले लोगों के लिए IS 19631:2026 मानक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह पोर्टेबल व्हीलचेयर रैंप के डिजाइन और निर्माण से जुड़ा स्वदेशी मानक है। इसमें रैंप की ढलान, पकड़, भार क्षमता और पोर्टेबिलिटी जैसे पहलुओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। यह केवल दिव्यांगजनों के लिए ही नहीं, बल्कि बुजुर्गों, छोटे बच्चों, स्ट्रोलर और ट्रॉली उपयोगकर्ताओं के लिए भी उपयोगी साबित होगा।
इन सभी मानकों को तैयार करने में बहु-हितधारक दृष्टिकोण अपनाया गया है। BIS की तकनीकी समितियों में उद्योग, शिक्षाविद, सरकारी संस्थान और सामाजिक संगठनों के विशेषज्ञ शामिल रहे। भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति जैसे संगठनों की भागीदारी ने इस प्रक्रिया को और अधिक व्यावहारिक और जमीनी बनाया।
यह पहल सुगम्य भारत अभियान को भी नई मजबूती प्रदान करेगी। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे स्टेशनों, सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में सुलभता बढ़ाने की दिशा में कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन अब नए मानकों के लागू होने से गुणवत्ता और सुरक्षा का स्तर और अधिक मजबूत होगा।
आर्थिक दृष्टि से भी यह पहल काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सहायक उपकरणों का वैश्विक बाजार तेजी से बढ़ रहा है और भारत के लिए इसमें अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि भारतीय निर्माता इन मानकों का पालन करते हैं, तो “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसी योजनाओं को नई गति मिलेगी। इससे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का निर्माण बढ़ेगा और निर्यात के नए अवसर भी पैदा होंगे।
हालांकि इन मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। छोटे और मध्यम उद्योगों में जागरूकता की कमी, मानकों के अनुपालन की लागत और तकनीकी जानकारी का अभाव बड़ी बाधाएं बन सकते हैं। इसके लिए सरकार को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना होगा।
उपभोक्ताओं के स्तर पर भी जागरूकता बढ़ाना आवश्यक होगा। जब लोग प्रमाणित और गुणवत्ता युक्त उपकरणों की मांग करेंगे, तभी बाजार स्वतः ही मानकों के अनुरूप ढलेगा। इसमें मीडिया, सामाजिक संगठनों और जन-जागरूकता अभियानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो यह पहल भारत को एक जिम्मेदार और समावेशी राष्ट्र के रूप में स्थापित करती है। ISO मानकों के अनुरूप तैयार किए गए ये दिशा-निर्देश भारतीय उत्पादों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाएंगे और निर्यात क्षमता को भी बढ़ाएंगे।
कुल मिलाकर 1 मई 2026 से लागू हुए BIS के नए गुणवत्ता मानक केवल तकनीकी नियम नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानव गरिमा की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। यदि इनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया, तो यह लाखों दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और आत्मनिर्भर बना सकता है।
✍️एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
गोंदिया, महाराष्ट्र

Editor CP pandey

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