नेताजी और मजदूर आंदोलन: कोलियरी से क्रांति तक

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और धनबाद का गुप्त मिशन: गोमो से आज़ादी की रणनीति कैसे बनी

✍️ अभिषेक यादव

भूमिका
23 जनवरी 1897 को जन्मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे नायक थे, जिनका जीवन साहस, त्याग और रणनीति का प्रतीक रहा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि झारखंड के धनबाद जिले का गोमो जंक्शन नेताजी के जीवन की एक ऐतिहासिक कड़ी है। यही वह स्थान है, जहां उन्हें आखिरी बार सार्वजनिक रूप से देखा गया था। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यहीं से नेताजी ने अंग्रेजों के खिलाफ अपने अंडरग्राउंड मिशन को धार दी थी।
📌 17 जनवरी 1941: जब गोमो बना आज़ादी की योजना का केंद्र
जनवरी 1941 का समय भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए निर्णायक था। अंग्रेज सरकार की कड़ी निगरानी के बीच नेताजी सुभाष चंद्र बोस कोलकाता से गुप्त रूप से निकल चुके थे। 17 जनवरी 1941 को वे अपने भतीजे डॉ. शिशिर बोस के साथ धनबाद के गोमो जंक्शन पहुंचे।
अंग्रेजों की नजर से बचने के लिए नेताजी सीधे स्टेशन से बाहर नहीं आए, बल्कि गोमो के हटियाटाड़ जंगल क्षेत्र में शरण ली। यह इलाका घना और अपेक्षाकृत सुरक्षित था, जहां स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों की मदद से गुप्त बैठक आयोजित की गई।

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🤝 गुप्त बैठक: आज़ादी की लड़ाई को मिली नई धार
इस ऐतिहासिक बैठक में स्वतंत्रता सेनानी अलीजान और प्रसिद्ध अधिवक्ता चिरंजीव बाबू शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य स्पष्ट था—
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की रणनीति बनाना।
यहीं से आगे चलकर नेताजी के जर्मनी, इटली और बाद में जापान जाने की योजना ने आकार लिया। यह बैठक केवल एक ठहराव नहीं थी, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक रणनीतिक मोड़ साबित हुई।
🛡️ स्थानीय लोगों की भूमिका: जोखिम में डाली जान
गोमो के स्थानीय निवासियों ने नेताजी की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाई। उन्हें लोको बाजार स्थित कबीले वालों की बस्ती में ठहराया गया, जहां सीमित लोगों को ही इस बात की जानकारी थी कि उनके बीच देश का सबसे बड़ा क्रांतिकारी मौजूद है।
स्थानीय नागरिकों ने न केवल भोजन और आवास की व्यवस्था की, बल्कि अंग्रेज अधिकारियों की गतिविधियों पर भी नजर रखी।

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🚆 18 जनवरी 1941: दिल्ली की ओर प्रस्थान
18 जनवरी 1941 को अलीजान और अधिवक्ता चिरंजीव बाबू की मदद से नेताजी को दिल्ली के लिए रवाना किया गया। इसके बाद उनका सफर भारत से बाहर तक गया, जिसने आगे चलकर आजाद हिंद फौज की नींव रखी।
📢 गोमो जंक्शन: जहां नेताजी को आखिरी बार देखा गया
कई प्रमाणित मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गोमो जंक्शन वह अंतिम स्थान है जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारत में सार्वजनिक रूप से देखा गया। इस ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वर्ष 2022 में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में किया था।
नेताजी के सम्मान में रेल मंत्रालय ने वर्ष 2009 में गोमो स्टेशन का नाम बदलकर

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमो जंक्शन कर दिया।
⛏️ 1930 से 1941: धनबाद से नेताजी का गहरा जुड़ाव
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का धनबाद से रिश्ता केवल 1941 तक सीमित नहीं था।
1930 के दशक में उन्होंने:
देश का पहला रजिस्टर्ड टाटा कोलियरी मजदूर संगठन स्थापित किया
मजदूरों को संगठित कर उन्हें अधिकारों के प्रति जागरूक किया
स्वयं इस संगठन के अध्यक्ष रहे
यह पहल भारतीय श्रमिक आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है।
🌺 आज भी जीवित हैं नेताजी की यादें
हर वर्ष 23 जनवरी को गोमो में नेताजी की जयंती विशेष श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।
इस अवसर पर:
नेताजी एक्सप्रेस ट्रेन के लोको पायलट, सहायक लोको पायलट और ट्रेन मैनेजर को सम्मानित किया जाता है
इंजन पर नेताजी की तस्वीर लगाकर ट्रेन को रवाना किया जाता है
यह परंपरा वर्षों से लगातार निभाई जा रही है

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🔎 निष्कर्ष
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और धनबाद का संबंध भारतीय इतिहास का वह अध्याय है, जो साहस, रणनीति और जनसहयोग का जीवंत उदाहरण है। गोमो जंक्शन केवल एक रेलवे स्टेशन नहीं, बल्कि आज़ादी की उस गाथा का साक्षी है, जिसने भारत को स्वतंत्रता की राह पर और मजबूती से आगे बढ़ाया।

Editor CP pandey

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