नरसिम्हा राव की नीतियों से भारत बना आर्थिक महाशक्ति

भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का वर्ष एक युगांतकारी मोड़ है। यह वही दौर था जब देश गहरे वित्तीय संकट से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार समाप्ति की कगार पर था, विकास दर ठहराव में थी और लाइसेंस-परमिट राज ने अर्थव्यवस्था की गति को जकड़ रखा था। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में प्रधानमंत्री बने पी. वी. नरसिम्हा राव ने साहसिक निर्णय लेते हुए भारत को आर्थिक सुधारों की नई दिशा दी।
नरसिम्हा राव की आर्थिक नीतियां वैचारिक कठोरता से मुक्त और व्यावहारिक सोच पर आधारित थीं। 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीति उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना ही बदल दी। उद्योगों को लाइसेंस की जटिल प्रक्रिया से मुक्त किया गया, जिससे निजी निवेश और उद्यमिता को नई ऊर्जा मिली।
निजीकरण के माध्यम से सरकारी नियंत्रण सीमित हुआ और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिला। वहीं वैश्वीकरण ने भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ा। विदेशी निवेश, आधुनिक तकनीक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से आईटी, दूरसंचार, बैंकिंग और सेवा क्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। भारत धीरे-धीरे एक बंद अर्थव्यवस्था से उभरती वैश्विक शक्ति बनने लगा।
इन सुधारों का सामाजिक प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई दिया। एक नया और सशक्त मध्यम वर्ग उभरा, रोजगार के अवसर बढ़े और उपभोक्ता बाजार का विस्तार हुआ। भारत, जो कभी आर्थिक सहायता पर निर्भर माना जाता था, आत्मविश्वास के साथ वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाने लगा।
हालांकि नरसिम्हा राव की नीतियों को लेकर असमानता और कृषि क्षेत्र की चुनौतियों जैसे सवाल भी उठे, लेकिन यह भी सत्य है कि ठहरे हुए देश को गति देने के लिए कठोर निर्णय आवश्यक थे। इन नीतियों ने भारत को दीर्घकालिक विकास की राह पर स्थापित किया।
अल्पमत सरकार और राजनीतिक दबावों के बावजूद नरसिम्हा राव ने सुधारों से समझौता नहीं किया। यही कारण है कि आज भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा की आधारशिला नरसिम्हा राव की दूरदर्शी नीतियों ने ही रखी।

rkpNavneet Mishra

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