पेंड़ तो नि:स्वार्थ छाँव देता है
खामोशियों से भी नेक काम होते हैं,
हमने पेंड़ों को छाँव देते हुए देखा है,
पेंड़ छाँव ही नही प्राण वायु भी देते हैं,
पेंड़ फल, फूल और हरे पत्ते भी देते हैं।
पेंड़ लकड़ी देते हैं तो मकान बनता है,
सावन में पेंड़ों पर झूला भी पड़ता है,
पशु पक्षियों को पेंड़ चारा भी देते हैं,
परिंदों को पेंड़ रहने की जगह देते हैं।
छाँव तो छाते से भी मिल जाती है,
छाँव छानी छप्पर से मिल जाती है,
इंसान की अपनी छत्र छाया से दूसरों
को बहुत कुछ सहायता मिल जाती है।
इंसान यदि इंसान के काम आये तो
वह इंसान की इंसान पर छत्र छाया है,
इसमें स्वार्थ भी हर किसी का होता है,
परंतु पेंड़ तो नि:स्वार्थ छाया देता है।
कौन कैसा है यही फिक्र रही ताउम्र,
हम कैसे हैं भूल कर भी नहीं सोचा,
ग़लत दिशा में चल रही भीड़ के साथ
नहीं, सही दिशा में चलना ही अच्छा।
जो जलता है वो बुझता है, दीपक हो,
बिजली का बल्ब या कोई इंसान हो,
सूर्य यदि उगता है तो डूबता भी तो है,
सुबह उजाला, तिमिर रात में होता है।
धन सदा के लिए, मित्र नहीं होता है,
पर मित्र सदा के लिए, धन होता है,
आदित्य मित्र धन से आनंद मिलता है,
मित्रधन जीवन का ख़ज़ाना होता है।
कर्नल आदि शंकर मिश्र, आदित्य
लखनऊ
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