“तृण धरि ओट क़हति वैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥”
दशरथ के राजमहल के भोजनकक्ष
में रानियाँ भोजन परोस रही थीं,
माता कौशल्या सहित सभी रानियाँ
बड़े प्रेम से भोजन खिला रही थीं।
सीता जी ने सबको खीर परोस दिया,
उसी समय हवा का एक झोंका आया,
सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भालीं,
दशरथ जी ने अपनी पत्तल सम्भाली।
सीता जी गौर से सब देख रही थीं,
उसी समय राजा दशरथ की खीर
में घास का छोटा तिनका गिर गया,
जिसे सीता जी तुरंत ने देख लिया।
अब खीर में कोई हाथ कैसे डाले,
ये प्रश्न आ गया, सीता जी ने दूर
से ही उस तिनके को घूर कर देखा,
वो जल कर वहीं राखबिंदु बन गया।
सीता जी ने सोचा किसी ने देखा नहीं,
लेकिन राजा दशरथ स्वयं सीताजी
के अद्भुत चमत्कार को देख रहे थे,
फिर भी दशरथ जी चुप रह गए थे।
अपने कक्ष में पहुँचकर राजा दशरथ
ने सीता जी को वहीं बुलवा लिया,
व सीता से कहा कि भोजन के समय
उन्होंने वह चमत्कार देख लिया था।
आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं,
लेकिन एक बात मेरी याद रखना,
जिस नजर से आज तिनके को देखा,
उस नजर से शत्रु को भी मत देखना।
इसीलिए सीता जी के सामने जब
लंकापति रावण आता था तो घास
के तिनके को उठाकर राजा दशरथ
की बात को वो याद कर लेती थीं।
तृण धरि ओट कहत वैदेही ।
सुमिरि अवधपति परम् सनेही॥
उस तृण की ओट का रहस्य यही था,
सीता जी चाहती तो रावण को जला
कर राख कर सकती थीं, पर दशरथ
जी को दिये वचन को वह नहीं भूलीं।
आदित्य प्रभू श्रीराम को रावण-वध
का श्रेय दिलाने हेतु भी वो शांत रहीं,
ऐसी शक्तिशीला व विशालहृदया थीं,
जनकनंदिनी, भूसुता, माता जानकी।
कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
लखनऊ
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