महामृत्युंजय मंत्र: भय से मुक्ति और चेतना के उत्थान का वैदिक सूत्र

कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय वैदिक परंपरा में महामृत्युंजय मंत्र केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच संतुलन स्थापित करने वाला आध्यात्मिक सूत्र है। यह मंत्र भय, रोग, संकट और मृत्यु-बोध से ऊपर उठकर मानव चेतना को आत्मिक शांति और जीवन की पूर्णता की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। हजारों वर्ष पूर्व रचित यह मंत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने वैदिक काल में था।

ऋग्वेद से आधुनिक युग तक मंत्र की यात्रा

महामृत्युंजय मंत्र की उत्पत्ति ऋग्वेद के सप्तम मंडल में मानी जाती है, जिसके द्रष्टा ऋषि मार्कंडेय बताए जाते हैं। इसके बाद यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी इसका उल्लेख मिलता है, जो इसकी व्यापक स्वीकृति और आध्यात्मिक महत्ता को प्रमाणित करता है। वैदिक ऋषियों के लिए मंत्र कोई जादुई शब्द नहीं, बल्कि चेतना को जाग्रत करने का साधन थे।

मृत्यु पर नहीं, मृत्यु-भय पर विजय का मंत्र

यह समझना आवश्यक है कि महामृत्युंजय मंत्र का उद्देश्य मृत्यु पर विजय पाना नहीं, बल्कि मृत्यु के भय से मुक्ति है। वैदिक दर्शन प्रकृति के नियमों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उनके साथ सामंजस्य स्थापित करने पर बल देता है। यह मंत्र असमय मृत्यु, रोग और मानसिक भय से रक्षा की कामना करता है, ताकि मनुष्य संतुलित और शांत जीवन जी सके।

पौराणिक कथा और गूढ़ अर्थ

पौराणिक मान्यता के अनुसार, अल्पायु ऋषि मार्कंडेय ने भगवान शिव की आराधना में इस मंत्र का जप कर मृत्यु-भय से मुक्ति प्राप्त की। यह कथा किसी चमत्कार से अधिक आत्मिक जागरण और चेतना के विस्तार का संकेत देती है।

मंत्र के शब्द— “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।”

यहाँ त्र्यम्बक शिव के त्रिनेत्र स्वरूप, सुगंधि जीवनदायी ऊर्जा और उर्वारुक (पका फल) के माध्यम से रोग, भय और आसक्ति के बंधनों से सहज मुक्ति की प्रार्थना की गई है। इसमें अमरत्व की नहीं, बल्कि मृत्यु के भय और पीड़ा से मुक्ति की भावना निहित है।

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विज्ञान और मनोविज्ञान भी मानते हैं प्रभाव

आधुनिक विज्ञान और मनोविज्ञान यह स्वीकार करते हैं कि ध्वनि और कंपन का मानव मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है। नियमित रूप से महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से मानसिक स्थिरता, तनाव में कमी और आत्मबल में वृद्धि होती है। इसी कारण रोग, संकट और मानसिक दबाव के समय इस मंत्र को विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।

आज के युग में मंत्र की प्रासंगिकता

महामृत्युंजय मंत्र उस काल में रचा गया, जब जीवन को केवल शरीर नहीं, बल्कि चेतना के व्यापक स्वरूप के रूप में देखा जाता था। ऋषियों का अनुभव था कि भय ही सबसे बड़ा रोग है, और भयमुक्त चेतना ही वास्तविक अमृत। आज विज्ञान और तकनीक में प्रगति के बावजूद मानव भय, असुरक्षा और मानसिक तनाव से मुक्त नहीं हो पाया है। ऐसे समय में यह मंत्र आत्मिक संतुलन और आंतरिक शक्ति की याद दिलाता है।

कालजयी वैदिक चेतना का प्रतीक

वास्तव में महामृत्युंजय मंत्र की उत्पत्ति केवल वैदिक इतिहास की घटना नहीं, बल्कि मानव चेतना के उत्थान की शाश्वत कथा है। मृत्यु का भय शाश्वत है और उससे मुक्ति की तलाश भी—इसी कारण यह मंत्र आज भी जीवंत, प्रभावशाली और प्रासंगिक बना हुआ है।

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Karan Pandey

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