महराजगंज में रमजान का संदेश: रहमत, मगफिरत और निजात की राह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। माह-ए-रमजान इबादत, सब्र और आत्मशुद्धि का पवित्र महीना माना जाता है। इस दौरान मुसलमान 29 या 30 दिनों तक रोजा रखकर अल्लाह की बंदगी करते हैं और संयम, करुणा व भाईचारे की भावना को मजबूत करते हैं। इस्लामी परंपरा के अनुसार रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है, जिनमें हर अशरे का विशेष आध्यात्मिक महत्व है।

पहला अशरा: रहमत की बरकत

रमजान के पहले दस दिन रहमत का अशरा कहलाते हैं। ग्राम सभा नयनसर के सोनौली मस्जिद के पेश इमाम हाफिज मोहम्मद सलमान और बृजमनगंज नगर पंचायत स्थित मस्जिद के पेश इमाम कारी सादिक रज़ा नेपाली के अनुसार, इन दिनों अल्लाह की विशेष कृपा बरसती है। ज्यादा से ज्यादा इबादत, जकात और सदका देकर जरूरतमंदों की मदद करना इस अशरे का मुख्य संदेश है।

दूसरा अशरा: मगफिरत की दुआ

11वें से 20वें रोजे तक का समय मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का माना जाता है। यह आत्ममंथन और तौबा का दौर होता है, जब इंसान अपने कर्मों का मूल्यांकन कर सच्चे दिल से अल्लाह से माफी मांगता है और बेहतर जीवन का संकल्प लेता है।

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तीसरा अशरा: निजात की तलाश

रमजान का अंतिम अशरा 21वें रोजे से चांद दिखने तक चलता है और इसे सबसे अहम माना जाता है। इसमें जहन्नुम की आग से निजात की दुआ की जाती है। इसी दौरान शब-ए-कद्र की पवित्र रात आती है, जिसे हजार महीनों से बेहतर बताया गया है। कई लोग एहतकाफ में बैठकर निरंतर इबादत में लीन रहते हैं।

नीयत की पाकीजगी पर जोर

धर्मगुरुओं का कहना है कि रमजान का असली मकसद दिखावा नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा हासिल करना है। रोजा केवल भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि बुरी आदतों से दूर रहकर आत्मसंयम, परोपकार और इंसानियत की राह अपनाने का माध्यम है।
रमजान का पैगाम समाज में प्रेम, शांति और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देना है, जो इंसानियत और भाईचारे को मजबूत करता है।

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Karan Pandey

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