✍️ पुनीत मिश्र
महादेव देसाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अनन्य सिपाहियों में थे, जिनका योगदान मंच से कम और संघर्ष की अंतर्धारा में अधिक दिखाई देता है। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि प्रखर राष्ट्रवादी लेखक, अनुवादक, संपादक और लगभग पच्चीस वर्षों तक महात्मा गांधी जी के सबसे विश्वसनीय सचिव व सहयोगी रहे। गांधी जी के विचार, पत्र, डायरी और आंदोलनों की जीवंत धड़कन यदि आज उपलब्ध है, तो उसके पीछे महादेव देसाई की अथक साधना और लेखन-निष्ठा प्रमुख आधार है।
महादेव देसाई का जन्म 1 जनवरी 1892 को सूरत (गुजरात) में हुआ। शिक्षा के दौरान ही उनमें साहित्य, भाषा और सार्वजनिक जीवन के प्रति गहरी रुचि विकसित हो गई थी। उन्होंने कानून की पढ़ाई की, किंतु उनका वास्तविक रुझान राष्ट्रसेवा की ओर था। 1917 में उनका जीवन निर्णायक मोड़ पर आया, जब वे गांधी जी के संपर्क में आए। यहीं से उनका जीवन व्यक्तिगत उन्नति से निकलकर राष्ट्रीय संघर्ष का अविभाज्य हिस्सा बन गया।
गांधी जी के साथ महादेव देसाई का संबंध केवल सचिव और नेता का नहीं था, बल्कि विचारों की साझेदारी, विश्वास और तपस्या का संबंध था। वे गांधी जी के दैनिक पत्र-व्यवहार, भाषणों, यात्राओं और आंदोलनों के साक्षी ही नहीं, बल्कि उनके दस्तावेजी इतिहासकार भी थे। गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ का अंग्रेज़ी अनुवाद हो या ‘हरिजन’ और ‘यंग इंडिया’ जैसे पत्रों का संपादन-महादेव देसाई की भूमिका केंद्रीय रही। उन्होंने गांधी के विचारों को विश्व-भाषा में पहुंचाया, बिना उनके नैतिक स्वर को क्षीण किए।
महादेव देसाई का लेखन राष्ट्रवादी चेतना से ओतप्रोत था। उन्होंने जेल-डायरी, यात्रा-वृत्तांत और वैचारिक टिप्पणियों के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन की आंतरिक दुनिया को शब्द दिए। उनकी ‘जेल डायरी’ केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दमन के बीच भारतीय आत्मसम्मान की गवाही है। वे भाषा के शिल्पी थे, सरल, स्पष्ट और प्रभावी। अनुवाद करते समय वे मूल भाव को जीवित रखते थे, जिससे गांधी का नैतिक आग्रह पाठक तक उसी तीव्रता से पहुंचता।
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स्वतंत्रता आंदोलन के कठिन दौर में महादेव देसाई ने कई बार कारावास भी झेला। किंतु न जेल की दीवारें उनकी कलम रोक सकीं, न थकान उनकी निष्ठा डिगा सकी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, पुणे के आगा खान पैलेस में गांधी के साथ नजरबंदी के समय 15 अगस्त 1942 को उनका निधन हुआ। ठीक उसी दिन जब गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया था। यह संयोग नहीं, बल्कि उस जीवन की नियति थी जो अंतिम सांस तक संघर्ष से जुड़ा रहा।
महादेव देसाई का मूल्यांकन किसी पद या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि उस विरासत से होना चाहिए जिसे उन्होंने सहेजा। वे गांधी जी के विचारों के संरक्षक थे। एक ऐसे सेतु, जिसने सत्य, अहिंसा और नैतिक राजनीति को समय और भाषा की सीमाओं से परे पहुंचाया। स्वतंत्र भारत के बौद्धिक इतिहास में उनका स्थान इसलिए अद्वितीय है, क्योंकि उन्होंने स्वयं को केंद्र में रखे बिना इतिहास को सुरक्षित रखा।
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आज जब सार्वजनिक जीवन में शब्दों की विश्वसनीयता और नैतिकता दोनों संकट में हैं, महादेव देसाई का जीवन यह याद दिलाता है कि लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। वे स्वतंत्रता संग्राम के उन मौन नायकों में थे, जिनके बिना इतिहास अधूरा है और जिनकी छाया में खड़े होकर विचार आज भी रोशनी पाते हैं।
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