लव मैरिज और संविधान: व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक परीक्षा

लव मैरिज पर माता-पिता की अनुमति अनिवार्य करने की मांग- संविधान,समाज और राज्य के टकराव का समकालीन विमर्श- एक समग्र विश्लेषण

लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने की मांग, व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियंत्रण की बहस को जन्म देता है

लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने की मांग ने इस निजी अधिकार को एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक विवाद में बदल दिया है

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक पारिवारिक और सांस्कृतिक संस्था माना जाता रहा है। बदलते समय के साथ जब युवा वर्ग ने लव मैरिज को अपनाया,तो यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई। किंतु हाल के वर्षों में गुजरात, हरियाणा और अब मध्य प्रदेश में लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने की मांग ने इस निजी अधिकार को एक बड़े संवैधानिक और राजनीतिक विवाद में बदल दिया है। यह प्रश्न केवल विवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक नियंत्रण की बहस को जन्म देता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि लव मैरिज आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन का संकेतक रही है शहरीकरण, शिक्षा महिलाओं की बढ़ती स्वतंत्रता और डिजिटल युग ने युवाओं को अपने जीवनसाथी के चयन का अधिकार दिया। हालांकि पारंपरिक समाज में इसे आज भी परिवार और जातिगत ढांचे के लिए चुनौती माना जाता है। यही कारण है कि लव मैरिज को लेकर समय-समय पर हिंसा, ऑनर किलिंग और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं।गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश: एक जैसी मांग, अलग-अलग संदर्भ-गुजरात में एक समाज,हरियाणा में एक विधायक और अब मध्यप्रदेश में प्रस्तावित आंदोलन तीनों राज्यों में मांग का स्वरूप भले ही समान हो, लेकिन इसके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक कारण अलग- अलग हैं। कहीं इसे सामाजिक स्थिरता से जोड़ा जा रहा है,तो कहीं पारिवारिक विघटन और अपराध से।

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साथियों बात अगर हम गुजरात हरियाणा मध्यप्रदेश  में लवमैरिज पर पेरेंट्स की परमिशन क़ी एक समाज की मांग को समझने की करें तो दो वर्ष पहले गुजरात के मेहसाणा में एक समुदाय ने सम्मेलन आयोजित कर लव मैरिज में माता-पिता की सहमति को कानूनन अनिवार्य बनाने की मांग की थी। इस सम्मेलन में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा था कि सरकार इस बात का अध्ययन करेगी कि क्या ऐसा कानून संवैधानिक सीमाओं के भीतर बन सकता है। हालांकि उन्होंने किसी त्वरित निर्णय से इनकार किया,लेकिन यहस्वीकार किया कि मांग सामाजिक रूप से गंभीर है।हरियाणा में पारिवारिक विघटन और अपराध का तर्क- हरियाणा से एक विधायक  ने विधानसभा में लव मैरिज को पारिवारिक विघटन कलह आत्महत्या और हत्या जैसी घटनाओं से जोड़ा। उनका तर्क था कि बिना पारिवारिक सहमति के विवाह करने वाले जोड़े सामाजिक दबाव में टूट जाते हैं, जिससे गंभीर अपराध होते हैं। इस आधार पर उन्होंने कानून बनाने की मांग की।मध्य प्रदेश में प्रस्तावित आंदोलन,अब मध्य प्रदेश में 21 तारीख से इस मांग को लेकर आंदोलन की तैयारी की जा रही है। यहां इसे सामाजिक संतुलन और परिवार की भूमिका को मजबूत करने की आवश्यकता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। यह संकेत करता है कि यह मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक एजेंडा का रूप ले रहा है। 

साथियों बात अगर हम तीनों राज्यों की गतिविधियों से क्या सरकार अध्यादेश ला सकती है? इसको समझने की करें तो, संवैधानिक दृष्टि से राज्य सरकारें विवाह से जुड़े विषयों पर कानून बना सकती हैं, क्योंकि यह समवर्ती सूची में आता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कोई राज्य ऐसा अध्यादेश ला सकता है जो माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करे? विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा कोई भी कानून सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा में टिकना बेहद कठिन होगा।भारतीय कानून में विवाह की वैधता भारतीय कानून स्पष्ट है (1) लड़की की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष (2) लड़के की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष,इन शर्तों को पूरा करने के बाद कोई भी दो वयस्क, चाहे वे किसी भी धर्म,जाति या समुदाय से हों विवाह कर सकते हैं। यदि धर्म अलग हो, तो स्पेशल मैरिज एक्ट,1954 के तहत विवाह पंजीकरण की सुविधा है।स्पेशल मैरिज एक्ट और 30 दिन का नोटिस-स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह के लिए 30 दिन का सार्वजनिक नोटिस देना अनिवार्य है। यह प्रावधान पहले से ही कई बार आलोचना का विषय रहा है, क्योंकि इससे जोड़ों की निजता खतरे में पड़ती है।इसके बावजूद कानून माता- पिता की अनुमति को अनिवार्य नहीं बनाता,बल्कि केवल आपत्ति दर्ज करने का अवसर देता है।

साथियों बात अगर हम संविधान और मूल अधिकारों का प्रश्न इसको समझने की करें तो, विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीशों के अनुसार, लव मैरिज पर माता-पिता की अनुमति अनिवार्य करना संविधान के मूल अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन होगा।(1)अनुच्छेद 19: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता- जीवनसाथी का चयन व्यक्ति की अभिव्यक्ति का एक मौलिक रूप है। इसे सीमित करना अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत प्राप्त स्वतंत्रता पर सीधा आघात है। (2) अनुच्छेद 21-व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन-सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि जीवन साथी चुनने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है। यह केवल जीवित रहने का नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है।सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों को देखें तो (1) शफीन जहां बनाम अशोक कुमार (हादिया केस) (2) लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य-इन फैसलों में अदालत ने स्पष्ट कहा कि दो वयस्कों की सहमति से किया गया विवाह पूरी तरह वैध है और राज्य या परिवार को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। 

साथियों बात अगर हम माता- पिता की भूमिका- नैतिक या कानूनी? इसको समझने की करें तो,संविधान माता-पिता को नैतिक मार्गदर्शन की भूमिका देता है, न कि कानूनी नियंत्रण की। विवाह जैसे निजी निर्णय में कानूनी बाध्यता लगाना परिवार को राज्य की शक्ति से लैस करने जैसा होगा।सामाजिक तर्क बनाम संवैधानिक सत्य-लव मैरिज से जुड़े अपराधों को आधार बनाकर कानून बनाने का तर्क कमजोर है। अपराध का कारण विवाह नहीं, बल्कि सामाजिक असहिष्णुता है। समाधान कानून नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और सुरक्षा व्यवस्था है। 

साथियों बात अगर हमरा इस मुद्दे को राज्य का कर्तव्य राजनीति और लोकप्रियता का प्रश्न इस दृष्टिकोण से समझने की करें तो, राज्य का दायित्व यह है कि वह वयस्क जोड़ों की सुरक्षासुनिश्चित करे,न कि उनकेनिर्णयों पर अंकुश लगाए। ऑनर किलिंग के मामलों में कठोर कार्रवाई इसका उदाहरण हो सकती है।राजनीति और लोकप्रियता का प्रश्न-लव मैरिज पर कानून की मांग कई बार लोकप्रिय राजनीति का औजार बन जाती है। इससे भावनात्मक मुद्दों पर वोट बैंक साधने की कोशिश होती है,जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।भविष्य की दिशा-यदि ऐसा कोई कानून लाया जाता है,तो यह न केवल न्यायिक चुनौती का सामना करेगा, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक और उदार छवि को भी नुकसान पहुंचाएगा। 

साथियों बात अगर हम लव मैरिज करने पर माता-पिता की परमिशन को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य मैं समझने की करें तो, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून विशेषकर यूएन कीमानवाधिकार घोषणा  और आईसीसीपीआर, व्यक्ति को विवाह में स्वतंत्र चुनाव का अधिकार देते हैं। भारत इन समझौतों का हस्ताक्षरकर्ता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगेक़ि संविधान सर्वोपरि हैँ,लव मैरिज के लिए माता-पिता की अनुमति को अनिवार्य करने की मांग सामाजिक चिंता से उपजी हो सकती है, लेकिन इसका समाधान संवैधानिक मूल्यों की बलि देकर नहीं निकाला जा सकता।भारत का संविधान व्यक्ति को परिवार और समाज से पहले नागरिक मानता है। इसलिए किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर ऐसा हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं हो सकता।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

Editor CP pandey

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