✍️ नवनीत मिश्र
“प्रीत करो तो ऐसी करो जैसी करे कपास।
जीते जी तन ढके, मरे न छोड़े साथ॥”
यह दोहा संत परंपरा के अमर कवि कबीर की वाणी का सार है। यह केवल प्रेम का वर्णन नहीं करता, बल्कि प्रेम की सच्ची परिभाषा प्रस्तुत करता है। कपास के उदाहरण के माध्यम से कबीर ने ऐसा आदर्श रखा है, जो त्याग, उपयोगिता और जीवनपर्यंत निष्ठा पर आधारित है।
जीवन और मृत्यु तक साथ
कपास जब तक खेत में रहती है, तब तक सौंदर्य बढ़ाती है। उससे धागा बनता है, वस्त्र बनते हैं और वह मनुष्य के तन को ढकती है। पर उसकी उपयोगिता यहीं समाप्त नहीं होती—मृत्यु के बाद वही कपास कफन बनकर अंतिम यात्रा में भी साथ देती है।
कबीर का संदेश स्पष्ट है—सच्चा प्रेम वही है जो स्वार्थरहित हो और जीवन के हर चरण में साथ निभाए।
संबंधों की बदलती परिभाषा
आज के दौर में कई रिश्ते सुविधा और लाभ-हानि के आधार पर टिके दिखाई देते हैं। सुख में निकटता और दुख में दूरी—यह प्रवृत्ति समाज में बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में ‘कपास’ जैसा प्रेम हमें स्थिरता और समर्पण का पाठ पढ़ाता है।
प्रेम केवल उत्सवों का साथी नहीं, बल्कि संघर्षों का सहारा भी होना चाहिए।
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कोमलता में शक्ति
कपास कोमल होती है, पर अत्यंत उपयोगी भी। ठीक वैसे ही प्रेम में कोमलता के साथ धैर्य, सहनशीलता और सेवा का भाव आवश्यक है। अहंकार, कठोरता और अपेक्षाओं का बोझ प्रेम को कमजोर कर देता है।
कबीर का संदेश है—प्रेम आचरण में दिखे, त्याग में झलके और निष्ठा में स्थिर रहे।
हर संबंध में लागू
यह दोहा पारिवारिक जीवन, मित्रता, दांपत्य और सामाजिक संबंधों पर समान रूप से लागू होता है। माता-पिता का स्नेह, सच्चे मित्र का साथ या जीवनसाथी का समर्पण—इन सभी में ‘कपास’ जैसा गुण होना चाहिए।
ऐसा प्रेम जो सहारा भी दे, संरक्षण भी करे और अंतिम क्षण तक साथ निभाए।
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