“इतिहास के पन्नों में अमर 5 जनवरी: वे विभूतियाँ जिनका जाना एक युग का अंत था”

5 जनवरी भारतीय एवं विश्व इतिहास में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऐसी महान विभूतियों की स्मृति का दिन है, जिनके योगदान ने समाज, संस्कृति, प्रशासन और कला को गहराई से प्रभावित किया। यह लेख 5 जनवरी को हुए महत्वपूर्ण निधन पर केंद्रित है, जिसमें प्रत्येक व्यक्तित्व के जन्म-परिचय, कार्यक्षेत्र और राष्ट्रहित में उनके योगदान का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
रमेश बहल (निधन: 5 जनवरी 1990)
भारतीय सिनेमा के सशक्त निर्देशक-निर्माता
रमेश बहल भारतीय फिल्म उद्योग के उन निर्देशकों में गिने जाते हैं, जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा को सशक्त कथ्य और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। उनका जन्म भारत में हुआ और उन्होंने मुंबई को अपनी कर्मभूमि बनाया, जो हिंदी फिल्म उद्योग का केंद्र है। रमेश बहल ने बतौर निर्देशक और निर्माता कई चर्चित फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें मनोरंजन के साथ-साथ पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता दी गई।
उनकी फिल्मों में निर्देशन की स्पष्टता, संगीत का संतुलित प्रयोग और पात्रों की सहज प्रस्तुति देखने को मिलती है। भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर में उनका योगदान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने नए कलाकारों और तकनीकी प्रतिभाओं को अवसर दिया। 5 जनवरी 1990 को उनके निधन से हिंदी फिल्म जगत ने एक संवेदनशील और व्यावहारिक दृष्टि वाले फिल्मकार को खो दिया।
सी. रामचन्द्र (निधन: 5 जनवरी 1982)
हिंदी फिल्म संगीत के नवाचारक
सी. रामचन्द्र का जन्म महाराष्ट्र राज्य, भारत में हुआ था। वे हिंदी सिनेमा के ऐसे संगीतकार, गायक और निर्माता-निर्देशक थे, जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत को नई दिशा दी। पश्चिमी धुनों और भारतीय रागों के अद्भुत समन्वय के लिए वे विशेष रूप से जाने जाते हैं।
उन्होंने 1940 और 1950 के दशक में कई कालजयी गीतों की रचना की, जो आज भी श्रोताओं के मानस पटल पर अंकित हैं। लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी महान गायिकाओं के साथ उनका संगीत सहयोग ऐतिहासिक माना जाता है। राष्ट्रहित में उनका योगदान सांस्कृतिक था—उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 5 जनवरी 1982 को उनके निधन से संगीत जगत में एक युग का अवसान हुआ।
मिर्ज़ा इस्माइल (निधन: 5 जनवरी 1959)
आधुनिक मैसूर राज्य के शिल्पकार प्रशासक
मिर्ज़ा इस्माइल का जन्म भारत में हुआ था और वे मैसूर रियासत के अत्यंत प्रभावशाली दीवान (प्रधान प्रशासक) रहे। वर्ष 1908 में वे मैसूर के महाराजा के सहायक सचिव नियुक्त हुए और बाद में प्रशासनिक कुशलता के कारण उच्च पदों पर पहुँचे।
उन्होंने मैसूर राज्य में औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना, शिक्षा और नगर नियोजन के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए। भद्रावती इस्पात संयंत्र, बैंकिंग व्यवस्था और आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की स्थापना में उनकी भूमिका राष्ट्रहित में अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 5 जनवरी 1959 को उनके निधन के साथ भारत ने एक दूरदर्शी प्रशासक को खो दिया, जिनकी नीतियाँ आज भी प्रशंसा का विषय हैं।
लॉर्ड लिनलिथगो (निधन: 5 जनवरी 1952)
ब्रिटिश भारत के विवादित किंतु निर्णायक वायसराय
लॉर्ड लिनलिथगो का जन्म यूनाइटेड किंगडम में हुआ था। वे एक ब्रिटिश राजनेता थे और 1936 से 1943 तक भारत के वायसराय रहे। उनका कार्यकाल द्वितीय विश्व युद्ध और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अत्यंत संवेदनशील काल से जुड़ा रहा।
हालाँकि वे ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि थे, फिर भी उनके निर्णयों ने भारतीय राजनीति की दिशा को गहराई से प्रभावित किया। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय उनकी भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। 5 जनवरी 1952 को उनके निधन के साथ औपनिवेशिक शासन के एक प्रमुख अध्याय का अंत हुआ।
बी. एम. श्रीकांतैया (निधन: 5 जनवरी 1946)
कन्नड़ साहित्य के आधुनिक स्तंभ
बी. एम. श्रीकांतैया का जन्म कर्नाटक राज्य, भारत में हुआ था। वे कन्नड़ भाषा के महान लेखक, कवि और अनुवादक थे। उन्होंने कन्नड़ साहित्य को आधुनिक चेतना से जोड़ा और विश्व साहित्य के श्रेष्ठ ग्रंथों का कन्नड़ में अनुवाद कर साहित्यिक क्षितिज को व्यापक बनाया।
उनका योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं था; उन्होंने भाषा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। शिक्षा और सांस्कृतिक जागरण में उनकी भूमिका राष्ट्रहित में अत्यंत मूल्यवान रही। 5 जनवरी 1946 को उनके निधन से कन्नड़ साहित्य ने अपना एक मार्गदर्शक खो दिया।
इतिहास के पन्नों में अमर 5 जनवरी: वे विभूतियाँ
न्याय और बौद्धिक चेतना के प्रतिनिधि अधिवक्ता
ज्ञानेन्द्र मोहन टैगोर का जन्म पश्चिम बंगाल, भारत में हुआ था। वे अपने समय के प्रख्यात अधिवक्ता और बौद्धिक व्यक्तित्व थे। टैगोर परिवार की परंपरा के अनुरूप उन्होंने समाज सुधार, विधिक चेतना और आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया।
उन्होंने कानून के क्षेत्र में नैतिक मूल्यों और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास किया। उनका जीवन राष्ट्रहित में बौद्धिक और सामाजिक योगदान का प्रतीक था। 5 जनवरी 1890 को उनके निधन से भारतीय समाज ने एक प्रखर विधिवेत्ता को खो दिया।

rkpNavneet Mishra

Recent Posts

डॉक्टरों ने जवाब दिया, बाबा से मांगी मन्नत और मिला बेटा

सोशल मीडिया से मिली सूचना, अधूरी मन्नत पूरी करने दौड़ी महिला देवरिया में बुलडोजर कार्रवाई…

3 hours ago

देवरिया में नशे में धुत्त बुलडोजर चालक का कहर, दर्जनों बाइक और कारें क्षतिग्रस्त, इलाके में अफरा-तफरी

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।उत्तर प्रदेश के देवरिया शहर में मंगलवार की देर शाम एक भयावह…

3 hours ago

माघ मेला में भीषण आग, 15 टेंट व 20 दुकानें जलीं

प्रयागराज (राष्ट्र की परम्परा)। माघ मेला के सेक्टर पांच स्थित नारायण शुक्ला धाम शिविर में…

4 hours ago

सोशल मीडिया पर वायरल धमकी वीडियो से देवरिया में तनाव, विधायक की सुरक्षा बढ़ी

देवरिया विधायक शलभ मणि त्रिपाठी को जान से मारने की धमकी, वायरल वीडियो से मचा…

4 hours ago

मानवीय सेवा और युवा चेतना का संगम: दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज में राष्ट्रीय युवा दिवस व रक्तदान शिविर

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दिग्विजय नाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोरखपुर में राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) की…

4 hours ago

ईवीएम गोदाम का निरीक्षण, निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रशासन का जोर

कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद में निर्वाचन प्रक्रिया को निष्पक्ष, पारदर्शी और सुरक्षित बनाए रखने…

5 hours ago