क्या सोशल मीडिया बना रहा है परिवारों के बीच दीवार?

सोमनाथ मिश्र की रिपोर्ट

सोशल मीडिया और अत्याधुनिक तकनीक के इस दौर में दुनिया जितनी छोटी हुई है, उतनी ही जटिल भी। मोबाइल फोन, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, वीडियो कॉल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने इंसान को हर समय जुड़ा रहने की सुविधा दी है। लेकिन इसी सुविधा के बीच एक अहम सवाल खड़ा हो रहा है — मीडिया और पारिवारिक रिश्ते क्या पहले से अधिक मजबूत हुए हैं या धीरे-धीरे कमजोर पड़ते जा रहे हैं?

आज मीडिया और पारिवारिक रिश्ते का रिश्ता एक डिजिटल पुल से जुड़ा हुआ है। दूर देश में रहने वाले माता-पिता अपने बच्चों को रोज़ स्क्रीन पर देख सकते हैं, परिवार के हर खास मौके की तस्वीरें और वीडियो पलभर में साझा हो जाती हैं। ग्रुप्स और चैट्स ने पारिवारिक संवाद को एक नया प्लेटफॉर्म दिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया और पारिवारिक रिश्ते ने दूरी की दीवार को तोड़ा है।

लेकिन दूसरी ओर, यही तकनीक रिश्तों के बीच एक नई दूरी भी पैदा कर रही है। एक ही घर में रहने वाले सदस्य अब आमने-सामने बात करने के बजाय मैसेज के माध्यम से संवाद कर रहे हैं। भोजन की मेज पर बातचीत की जगह अब सोशल मीडिया स्क्रॉल करता हुआ मोबाइल ले चुका है। बच्चों और बुजुर्गों के बीच संवाद कम होता जा रहा है, क्योंकि हर कोई अपनी-अपनी स्क्रीन की दुनिया में व्यस्त है। इस तरह मीडिया और पारिवारिक रिश्ते दिखावटी जुड़ाव में बदलते जा रहे हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि मीडिया और पारिवारिक रिश्ते की मूल समस्या ‘उपस्थिति की कमी’ है। हम ऑनलाइन तो मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अनुपस्थित होते जा रहे हैं। रिश्तों की गर्माहट, जो आमने-सामने बैठकर बात करने, मुस्कुराने और एक-दूसरे की आवाज़ सुनने से आती थी, वह धीरे-धीरे कम हो रही है। वर्चुअल दुनिया ने वास्तविक दुनिया के रिश्तों को कमजोर करना शुरू कर दिया है।

हालांकि, इसका समाधान पूरी तरह से तकनीक से दूरी बनाना नहीं है। जरूरत है सही और संतुलित इस्तेमाल की। अगर मीडिया का उपयोग सिर्फ मनोरंजन तक सीमित न होकर संवाद और पारिवारिक जुड़ाव बढ़ाने के लिए किया जाए, तो मीडिया और पारिवारिक रिश्ते फिर से मजबूत हो सकते हैं। परिवार के साथ बैठकर समय बिताना, बिना मोबाइल के बातचीत करना और रिश्तों को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी हो गया है।

आज की सबसे बड़ी जरूरत यह समझने की है कि मीडिया एक साधन है, जीवन नहीं। अगर हम रिश्तों को समय, सम्मान और भावनाएं देंगे, तो मीडिया और पारिवारिक रिश्ते कभी कमजोर नहीं पड़ेंगे। वरना स्क्रीन की इस चमक में हम अपने ही अपनों से दूर होते चले जाएंगे।

अंततः यह सवाल तकनीक का नहीं, हमारे चुनाव का है — क्या हम मीडिया और पारिवारिक रिश्ते को संवारेंगे, या उसे सिर्फ डिजिटल दिखावे तक सीमित कर देंगे?

rkpshomnath

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