भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता: अमेरिका में बढ़ी बेचैनी

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने वाला कदम माना जा रहा है। इस ऐतिहासिक करार को “मदर ऑफ ऑल डील” नाम दिया गया है। दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में लगभग 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच हुआ यह समझौता भारत के लिए आर्थिक के साथ-साथ भू-राजनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।

अमेरिका के दबाव के बीच बड़ा कदम

यह समझौता ऐसे समय पर हुआ है जब ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाकर दबाव बनाने की कोशिश की थी। ऐसे माहौल में यूरोपीय संघ के साथ भारत का यह करार दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपने रणनीतिक विकल्प खुद तय कर रहा है। इस डील के बाद अमेरिका में बेचैनी साफ तौर पर देखी जा रही है।

क्यों ऐतिहासिक है भारत–EU FTA

भारत और यूरोपीय संघ के बीच इस समझौते पर कई वर्षों से बातचीत चल रही थी। इस डील से—

• भारत को यूरोपीय बाजारों तक बेहतर पहुंच मिलेगी

• निर्यात और विदेशी निवेश में बढ़ोतरी होगी

• रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे

• व्यापारिक शुल्क कम होंगे और सप्लाई चेन मजबूत होगी

• टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी में सहयोग बढ़ेगा

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत चीन पर निर्भरता कम कर पाएगा और खुद को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करेगा।

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अमेरिका की नाराजगी, टैरिफ में राहत से इनकार

भारत-EU समझौते के बाद अमेरिका की प्रतिक्रिया सख्त रही है। ट्रंप प्रशासन के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने साफ कहा है कि भारत को अमेरिका की ओर से टैरिफ में फिलहाल कोई राहत नहीं मिलेगी।
फॉक्स बिजनेस को दिए इंटरव्यू में ग्रीर ने कहा कि रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की चिंताएं अब भी बनी हुई हैं। उन्होंने माना कि भारत ने रूसी तेल की खरीद कुछ हद तक कम की है, लेकिन पूरी तरह इससे अलग होना फिलहाल संभव नहीं है।

रूसी तेल पर बदला अमेरिका का रुख

ग्रीर का यह बयान अमेरिका के पहले के दावों से अलग है। इससे पहले ट्रंप प्रशासन और खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह कह चुके थे कि भारत ने रूस से तेल खरीद लगभग बंद कर दी है।
हाल ही में दावोस इकोनॉमिक फोरम में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया था कि भविष्य में भारत को टैरिफ में राहत मिल सकती है, लेकिन ताजा बयान से साफ है कि अमेरिका फिलहाल दबाव की रणनीति जारी रखना चाहता है।

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Karan Pandey

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