सावन में श्री दुःख हरण नाथ मंदिर बना शिवभक्ति का केंद्र

सावन में गूंजा हर-हर महादेव, दुःखहरण नाथ मंदिर बना शिवभक्तों का तीर्थ

उतरौला बलरामपुर(राष्ट्र की परम्परा)
बलरामपुर जिले के उतरौला नगर में स्थित चिरप्राचीन दुःखहरण नाथ मंदिर सावन मास में एक बार फिर श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक एकता का केंद्र बन गया है। मंदिर की ऐतिहासिकता और आध्यात्मिक महत्ता के कारण यहां प्रतिवर्ष सावन के महीने में हजारों श्रद्धालु बाबा भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक हेतु पहुंचते हैं।

इस पावन मास में नगर के कोने-कोने से श्रद्धालु बैर, बेलपत्र, अक्षत, दुग्ध और पुष्प लेकर बाबा के दरबार में पहुंच रहे हैं। ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठता है। शिवरात्रि, कजरीतीज और छठ की तरह ही सावन मास के हर सोमवार को यहां विशेष पूजा और मेला भी लगता है, जिसमें नगर और आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं।

बुद्धकाल से जुड़ी है मंदिर की पृष्ठभूमि

यह मंदिर केवल धार्मिक नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति की जीवंत विरासत है। नगर के प्राचीन इतिहास में यह मन्दिर बुद्ध युग की मूर्तिकला का सजीव प्रमाण है। मान्यता है कि राजा नेवाज खान के शासन काल में बाबा जयकरन गिरि को इस स्थान पर मंदिर की पुनः प्राप्ति का स्वप्न हुआ, जिसके बाद खुदाई में प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुईं। इन्हीं मूर्तियों के चारों ओर महादेव जी का शिवाला बनवाया गया।

मंदिर निर्माण में रही है हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की भूमिका

इतिहास गवाह है कि मुस्लिम राजा नेवाज खान ने मंदिर निर्माण और पुनरुद्धार में न केवल आर्थिक सहायता दी, बल्कि गौर गुमड़ी के जंगल, ग्राम कटरा और गुमड़ी की जमीन भी दान की। यह मंदिर गंगा-जमुनी तहजीब का सशक्त प्रतीक है, जहाँ धर्म और संस्कृति के नाम पर एकता और सहिष्णुता की मिसाल पेश की गई।

महंत बाबा मयंक गिरि कर रहे सेवा-संवर्धन का कार्य

वर्तमान में मंदिर के महंत बाबा मयंक गिरि मंदिर की धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ इसकी संरक्षण और विकास की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं। नगर पालिका परिषद द्वारा मंदिर के मुख्य द्वार के सामने स्थित पोखरे के सौंदर्यीकरण का कार्य कराया गया है जिससे मंदिर की भव्यता और विशाल हो गई है।

सावन में होती है अद्वितीय आस्था की बयार

श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार और मंगलवार को यहां भव्य जलाभिषेक, भजन-कीर्तन और हवन पूजन का आयोजन किया जाता है। मंदिर के दक्षिण में स्थित हनुमान मंदिर में मंगलवार को भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। साथ ही, राधा-कृष्ण मंदिर, मुक्तिधाम, चित्रगुप्त मंदिर और भव्य पीतल का हनुमान नकाब भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं।

उतरौला के दुःखहरण नाथ मंदिर की यह गौरवशाली परंपरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाती है कि जब इतिहास, संस्कृति और धर्म एक साथ चलते हैं, तो वह स्थान एक ‘तीर्थ’ बन जाता है।

rkpnews@desk

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