नेहरू के प्रशंसक, अंधभक्त नहीं: शशि थरूर के बयान से राजनीति में नई बहस
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)केरल में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस सांसद शशि थरूर के ताजा बयान ने देश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। थरूर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रशंसक हैं, लेकिन उनके हर विचार और हर निर्णय का समर्थन करना बौद्धिक ईमानदारी नहीं होगी। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब देश में इतिहास और विरासत को लेकर सियासी टकराव लगातार तेज होता जा रहा है।
शशि थरूर ने कहा कि नेहरू ने आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक आधारशिला रखी, मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और भारत को वैश्विक पहचान दिलाई। इन योगदानों को नकारा नहीं जा सकता। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ फैसलों पर सवाल उठना स्वाभाविक है, खासकर 1962 के चीन युद्ध से जुड़े निर्णयों पर। थरूर के मुताबिक, नेहरू आलोचना से परे नहीं हैं, लेकिन हर मौजूदा समस्या के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना इतिहास के साथ अन्याय है।
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अपने बयान में थरूर ने सत्तारूढ़ भाजपा पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने नेहरू को एक “सुविधाजनक बलि का बकरा” बना लिया है। हर असफलता और हर कठिन सवाल से बचने के लिए बार-बार नेहरू का नाम उछाला जाता है, जो न तो राष्ट्र निर्माण में सहायक है और न ही जनता को सच्चाई से रूबरू कराता है।
राजनीतिक गलियारों में इस बयान को लेकर प्रतिक्रियाएं तेज हैं।
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कांग्रेस के भीतर इसे संतुलित और विचारशील वक्तव्य माना जा रहा है, वहीं भाजपा समर्थक इसे नेहरू विरोधी रुख के रूप में देख रहे हैं। कुल मिलाकर, शशि थरूर का यह बयान आज की राजनीति को एक अहम संदेश देता है—इतिहास को समझने की जरूरत है, उसे सियासी हथियार बनाने की नहीं। सम्मान और विवेक साथ-साथ चल सकते हैं, यही इस बयान का सार है।
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