365 दिन अपने बलबूते खड़ी रहती है हिंदी

हिंदी पखवाड़ा पर केंद्रित

हिंदी की खोज-खबर लेने का विशेष दिन है हिंदी दिवस. इस अवसर पर कुछ औपचारिक कार्यक्रम होते हैं. हिंदी की दशा और दिशा पर सुख-दुख व्यक्त किया जाता है. कोई डराता है तो कोई उत्साह प्रकट करता है. तरह-तरह की संभावनाएं रेखांकित की जाती हैं. इसी तरह की रस्म अदायगी के साथ एक पखवाड़ा पूरा कर लिया जाता है.

हिंदी की ऐतिहासिक और क्रांतिकारी भूमिका के कारण उसका उत्सव मनाया जाना वाजिब है. राजभाषा हिंदी और उसका समृद्ध साहित्य
निश्चय ही गौरवान्वित करने वाला है. किंतु इससे यह समझ विकसित करना कि हिंदी दिवस या पखवाड़ा मनाने से हिंदी ताकत अर्जित करती है, संदेहास्पद है. हिंदी के उन्नयन एवं विकास की चिंता से अभिसिंचित हिंदी दिवस से हिंदी का कोई विशेष हित नहीं सधता है. हिंदी वर्षभर अपने बलबूते खड़ी रहने वाली भाषा है.

हिंदी की शक्ति को समझने के लिए उसकी मौसेरी बहन उर्दू को गौर करने की जरूरत है. उर्दू एक बेहद खूबसूरत भाषा है. नजाकत और नफासत से भरी उर्दू की खुशबू से कौन नहीं वाकिफ होगा! अदब की भाषा उर्दू का कोई शानी हो, मुश्किल है. इन सब के बावजूद उर्दू की स्थिति नाजुक है. उर्दू की स्वीकार्यता होने के बावजूद वह कमजोर स्थिति में नजर आती है.
इसका सबसे बड़ा कारण है उर्दू का ज्ञान की भाषा में तब्दील न हो पाना. और यही हिंदी की शक्ति का मूल है. मौजूदा समय में हिंदी ज्ञान की भाषा के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है. इसमें अनुवाद की बड़ी भूमिका है. हिंदी ने देश दुनिया के बेहतरीन ज्ञान विज्ञान को अपनी भाषा में अनुवाद के माध्यम से शामिल कर स्वयं को समृद्ध किया है. वह इस प्रक्रिया में निरंतर विकासमान है. कहना न होगा कि वही भाषा बची रहेगी, जो ‘ज्ञान की भाषा’ होगी. संस्कृत को बोलने वाले मुश्किल से मिलेंगे. लेकिन संस्कृत आज भी सुरक्षित है और आगे भी रहेगी. इसका कारण एक है संस्कृत ज्ञान की भाषा है. ज्ञान की प्रासंगिकता जब तक रहेगी संस्कृत बनी रहेगी. इसमें हिंदी की भूमिका विशिष्ट है. वह राजभाषा है, बाजार की भाषा है, ज्ञान की भाषा है, सिनेमा की भाषा है, संवेदना और शिल्प की भाषा है. आम जुबान की भाषा है. और दुनिया को इस भाषा की जरूरत है.

एक भाषा के तौर पर हिंदी भारत का प्रतिरूप है. जिसमें उदारता, समावेशिका, स्वीकार्यता, समन्वय और विविधता को देखा जा सकता है. हिंदी का स्वरूप समय की मांग के अनुसार बनता व ढलता रहा है. जड़ता के खिलाफ है हिंदी. इसका लचीलापन विविधताओं का स्वागत करता रहा है. ‘आनो भद्रा क्र्तवो यन्तु विश्वतः’ का सुंदर उदाहरण है हिंदी. हिंदी की कमियां गिनाने वाले उसे बोलियों का समूह कहकर उलाहना देते हैं. जब किया उसकी उदारता और समावेशिका का परिचायक है. एक और जरूरी बात यह है कि यदि तमिलनाडु का व्यक्ति लड़खड़ाती हुई जुबान में हिंदी बोलता है तो यह हिंदी का प्रसार व स्वीकार्यता का द्योतक है. इसमें हिंदी के भ्रष्ट होने की संभावना नहीं खोजी जानी चाहिए. व्याकरण और शुद्धता का अत्यधिक आग्रह भारत जैसे बहुरंगी देश में उचित नहीं है. तमिलनाडु या केरल की लड़खड़ाती जुबान में भी हिंदी भारत को एकता के सूत्र में पिरोती है. हिंदी ने तमिलनाडु से तकनीकी तक प्रत्येक जगह अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराई है.

तेजी से बदल रही दुनिया के पीछे सबसे बड़ी भूमिका टेक्नोलॉजी की ही है. जिस विचार या टेक्नोलॉजी का समय आ गया हो, उसे रोका नहीं जा सकता. हाँ, सामंजस्य के बिंदु तलाशे जा सकते हैं. खारिज करने के बजाय संग्रह और त्याग की सीमा चिन्हित की जा सकती है. विविध संदर्भ में उसके प्रभाव पर विचार किया जा सकता है. समय के साथ प्रभाव की लकीरें अधिक स्पष्ट होती जाती हैं.

एआई और हिंदी के बीच बेहतर तालमेल दिख रहा है. हालांकि हिंदी का अपना दो संदर्भ है : भाषा और साहित्य. एआई अर्थात कृत्रिम बुद्धिमत्ता मूलतः और अंततः कृत्रिम ही है. इसका उत्पादन चाहे जितना सुंदर हो, किंतु होगा कृत्रिम ही. मसलन एआई से कविता गढ़ी जा सकती है. किंतु रचनात्मकता में फर्क की बारीक लकीरें होंगी ही. एआई के बावजूद नैसर्गिकता का सौंदर्य बचा रहेगा. साहित्य अमूमन अनदेखे, अनचीन्हे या धुंधले पड़ गए को उजागर करता है. जबकि एआई बखूबी देखे-पहचाने से ही शक्ति अर्जित करता है.

एआई बेहतरीन और बहुरंगी मजमून प्रस्तुत कर सकता है. कालिदास या शेक्सपीयर का विकल्प नहीं. मानव मन स्वयं में इतनी जटिलता समेटे हुए है कि उसे पूरी तरह डिकोड कर पाना लगभग असंभव है. इसी मन की अभिव्यक्ति के क्रम में श्रेष्ठतम रचे जाने के बावजूद अपरमपार संभावनाएं शेष हैं. संवेदनशीलता इसी अशेष को असीम सृजनात्मकता प्रदान करती है. एआई चाहे जितनी सुंदर तस्वीरें खींचे, कलाकार की कुंची लिओनार्दो द विंची रचती रहेगी.

हिंदी भाषा की दृष्टि से एआई की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतीत हो रही है. हिंदी की समावेशी प्रवृत्ति में न केवल भिन्न भाषाओं के शब्द और ज्ञान को स्वीकार किया, बल्कि टेक्नोलॉजी के साथ भी बेहतर कदमताल की कोशिश करती रही है. एआई से हिंदी भाषा को मजबूती मिलेगी. हिंदी की पैठ लोगों के बीच बढ़ेगी. प्रथमया तो व्याकरण, शब्दकोश आदि की दृष्टि से लोगों की लेखनी दुरुस्त होगी. यह अपने आप में एक तरह का हिंदी को सीखने व बरतने का भी प्लेटफार्म हो सकता है.

एआई कार्यालय में प्रयुक्त होने वाली हिंदी की राह को आमजन के लिए भी सुबोध बना सकती है. कचहरी की भाषा अपनी दुरुहता और पुरानेपन के कारण बोधगम्यता की दृष्टि से कमजोर दिखती है. एआई इस दिशा में भी सहायक हो सकता है.

दुनिया के पटल पर हिंदी का बाजार अपने आकार के कारण मायने रखता है. एआई इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. भाषा और ज्ञान के स्तर पर दुनिया के साथ लेनदेन की प्रक्रिया में भी एआई की भूमिका निर्णायक हो सकती है. फिलहाल हम अभी एआई के पहले चरण में हैं. सावधानियां और फायदे दोनों ही मौजूद हैं. आने वाला समय बताएगा कि एआई की भूमिका कितनी परिवर्तनकारी होगी! हिंदी पखवाड़ा की हार्दिक शुभकामनाएं!

  • डॉ.अभिषेक शुक्ल,
    सहायक प्रोफेसर,
    दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय,
    गोरखपुर
rkpnews@somnath

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