देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)जिला मुख्यालय की सबसे व्यस्त मानी जाने वाली अस्पताल रोड, जहां से रोजाना हजारों लोग गुजरते हैं—लेकिन इसी सड़क के किनारे विगत छह माह से एक लावारिस युवा विक्षिप्त अवस्था में जीवन और मौत के बीच जूझ रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि वन स्टॉप जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज जैसी बड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच खुले आसमान के नीचे जिंदगी काट रहा यह युवक क्यों आज तक इलाज और सहारा से वंचित है?
भोजन तो मिलता है… इलाज कौन करेगा?
राह चलते लोग और एक समाजसेवी संगठन की भोजन गाड़ी से उसका पेट तो कभी-कभी भर जाता है, लेकिन शरीर की बिगड़ती हालत और बेसुध पड़ी स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सिर्फ दो वक्त की रोटी ही जीवन का सहारा है, इलाज नहीं?
प्रशासन और समाज की बेरुखी
यहां प्रशासनिक अमले की चुप्पी और सामाजिक संगठनों की नदारद भूमिका सबसे ज्यादा खटकती है। शहर में सक्रिय तमाम स्वयंसेवी संस्थाएं हर वक्त अपने “सामाजिक कार्य” का बखान करती हैं, लेकिन सड़क पर तड़पते इस बेसहारा युवक तक कोई नहीं पहुंचा। वहीं प्रशासनिक तंत्र भी मानो आंख मूंदे बैठा है।
अगर समय पर हाथ बढ़े होते…
स्थानीय लोग बताते हैं कि यदि प्रशासन या कोई संस्था समय रहते आगे आती, तो संभव था कि यह युवक अपने परिजनों तक पहुंच जाता या कम से कम उसका इलाज शुरू हो पाता। लेकिन आज वह बेसुध हालत में पड़ा है—और शायद धीरे-धीरे जिंदगी की डोर टूट रही है।
शहर का आइना
जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज जैसी स्वास्थ्य संस्थाओं के सामने पड़ा यह नजारा न सिर्फ प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि समाज की सामूहिक बेरुखी का आईना भी दिखाता है।
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