
हमारी जिंदगी में अच्छे लोग
कभी कभी बड़ी देर से आते हैं,
मगर फिर वही उम्र भर के लिये
ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।
मेरी उम्र तो बहुत कम बची है,
और शरीर भी मिट्टी से बना है,
इसे मिट्टी में ही मिल जाना है,
फिर तेरा-मेरा क्या फ़साना है।
कुछ चीजें पसंद कर रहे थे,
तो कुछ चीजें पसंद थीं नहीं,
सुख शांति पसन्द कर रहे थे,
सुख शांति मिलती कहीं नहीं।
हमारी पसंद होने से क्या होगा,
सबकी पसंद सबको कहाँ मिलती,
न कोई साथ है, न कोई संयोग है,
सारी बीत गई, बची बस थोड़ी है।
न कुछ होता है, न अब करना है,
बुढ़ापा बीत रहा है थोड़ी बची है,
भगवद्भजन व धर्म कर्म ही बचे हैं,
विरक्त व्यक्ति, आसक्ति नहीं है।
36 साल सात महीने जवानी के,
जो बिताये मैंने देश की सीमा पे,
एंजॉय किया, संगीनों के साये में,
सैनिक बैरकों, सीमा के बंकरों में।
मेहनत के बाद ख़ुशी मिलती है,
आदित्य यह कहना तो ठीक है,
सैनिक और मज़दूर ऐसे होते हैं,
यह मानना दुनिया का दस्तूर है।
- डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’