शाहजहांपुर (राष्ट्र की परम्परा) किसी समय रंगदेव की गढ़िया रंगीन गड़ी थी आज गढ़िया रंगीन के नाम से जाना जाता तकरीबन 250 सौ साल पुराना है ठा, रंग देव सिंह उर्फ रंगी सिंह ने परिवित किया था उन्हीं के खानदान के याद में सन् 1925 में एक कोठी बनवाई गई जो उनके खानदान की यादों को संजोए हुए है लेकिन अब वही कीटी खंडहर में तब्दील हो गई है।
उर्दू अंग्रेजी व हिंदी में ठाकुर बृजपाल सिंह के आज भी इमारत पर नाम लिखा हुआ है उसकी विशेषता स्थाई रूप से है अक्षरों को कारीगरों ने ईंट को इस तरह से तराशा है कि व्यक्ति देखते ही इस शब्दों को ओर आकर्षित हो जाता है यह कोठी करबा के बीचों बीच में रिथत है कोठी जुड़ा है जो
कस्बे के अंदर होते हुए पुनः बाइपास मार्ग में जोड़ दिया गया है लेकिन इसके ऊपर छोड़ से पीपल के पड़ को कई बार काटा
गया लेकिन वह फिर से थोड़े समय में ही यैयार हो जाता है जिसके ऊपर क्रम से एक -एक द्वार पर बत्तियां जाता है कि ठाकुर बृजपाल सिंह कहते थेएक कोठी आज भी कई अजूबे अपने में संजोए हैं 8वर्षे चले इस कोटी के निर्मण कार्य को रामपुर व अलीगढ़ के मौलाना बख्श व खुदाबख्श नाम के कारीगरों ने किया था जिसकी चर्चा आज भी क्षेत्र के बुजुर्गों को जबान पर गुन गुना रही है
इस कोठी में मुख्य तीन दरबार है जो की बहुत ही देखने में अनमोल लग रहे हैं
की 1925 में मृत्यु के बाद में उनकी माता रानी सावित्री देवी व धर्मपत्नी नवाबकुमारी इस जायदाद की मलिक बनी इस कोठी की कुछ कार्य को उन्होंने आगे बढ़ाया ठाकुर बृजपाल सिंह के पिता का देहांत हो गया था ठाकुर सरनाम सिंह का उसी समय देहांत हो गया था बृजपाल सिंह को उम्र मात्र को जाने का मार्ग करते के बाईपास से 2 बर्ष की थी ठाकुर बृजपाल सिंह भी मात्र 32वर्ष की आयु पूरी करने के बाद रवर्ग सिंघार गए उन्होंने इस कोठी को स्वाभाविक के कारण बनवाई थी जो कि आज पूरी तरीके से जर्जर हो चुकी है जिस पर किसी ने आज तक कोई ध्यान नहीं दिया है इस प्राचीन कोठी पर आज के समय गोबर कूड़ा कचरा पड़ रहा है
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