व्यंग्य : परिवार का भरोसा, रिश्तेदारी में परोसा
संजय एम. तराणेकर
राजनीति में भरोसे का भी अपना एक पारिवारिक अध्याय होता है, जो शायद कभी समाप्त नहीं होता। बस शर्त इतनी है कि परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बच्चों का जन्म होता रहे। परिवार बढ़ेगा तो संभावनाएं बढ़ेंगी और संभावनाएं बढ़ेंगी तो राजनीति में परिवार भी खिलेगा!
राजनीति भी गजब की चीज है। मौसम बदलने में भले समय लग जाए, लेकिन राजनीतिक समीकरण बदलने में कभी-कभी एक बैठक ही पर्याप्त होती है। कल तक जो नेता पार्टी के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था, आज वही पार्टी की जिम्मेदारी का दरवाजा खोलने की स्थिति में आ सकता है। और अगर पीछे परिवार का भरोसा खड़ा हो तो राजनीति की सीढ़ियां कुछ ज्यादा ही सुविधाजनक दिखाई देने लगती हैं। यानी राजनीति में अगली पीढ़ी की एंट्री का एक और अध्याय शुरू!
अब राजनीति में परिवार का महत्व समझना हो तो किसी सरकारी दफ्तर की पुरानी फाइल देख लीजिए। ऊपर से नीचे तक सब कुछ व्यवस्थित नजर आएगा, बस यह पता लगाना मुश्किल होगा कि अगली फाइल आखिर किसके हाथ में पहुंचने वाली है!
कभी राजनीति में बड़े गर्व से कहा जाता था—“कार्यकर्ता ही पार्टी की रीढ़ है।” आधुनिक राजनीति ने इस पुराने वाक्य में एक नया फुटनोट जोड़ दिया है—“और परिवार रीढ़ के पास बैठा सलाहकार भी हो सकता है!”
आखिर राजनीति में अपेक्षाकृत नए लोगों को भी मौका दिया जाता है। यदि वे परिवार से हों तो आश्चर्यचकित होने की जरूरत नहीं। आखिर भरोसे की राजनीति भी कोई चीज है! सलाहकारों की टोली चाहे तो यह तर्क भी दे सकती है कि संबंधित व्यक्ति पिछले कुछ समय से सक्रिय थे, इसलिए पार्टी ने उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। अब सवाल यह नहीं रह गया कि राजनीति में अनुभव कितना है, बल्कि यह भी है कि अनुभव हासिल करने का अवसर किसे और कितनी जल्दी मिलता है।
परिवारवाद पर राजनीतिक बहस कोई नई बात नहीं है। लगभग हर दल में कभी न कभी यह सवाल उठता रहा है कि संगठन में रिश्तेदारी और योग्यता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। समर्थक इसे भरोसे और निरंतरता का नाम देते हैं, तो आलोचक इसे अवसरों के सीमित दायरे से जोड़ते हैं। जनता दोनों पक्षों की बातें सुनती है और फिर अपनी समझ से निष्कर्ष निकालती है।
भारतीय राजनीति की खूबसूरती भी देखिए—यहां पद का नाम जितना बड़ा होता है, उसके साथ जुड़ी चर्चा उससे भी बड़ी हो जाती है। “राष्ट्रीय संयोजक” शब्द सुनते ही लगता है कि अब पूरे देश की राजनीति की चाबी शायद उनकी जेब में आ गई होगी। भले ही जिले के पचास कार्यकर्ताओं के नाम याद हों या न हों! इससे तो यही साबित होता है कि पार्टी में परिवार का भरोसा भी बड़ी चीज है। आखिर परिवार नहीं होगा तो पार्टी भरोसा किस पर करेगी?
यह अलग बात है कि असली परीक्षा तो संगठन की बैठक में होती है, जब दस लोग एक साथ बोल रहे हों और किसी एक को सबकी बातें सुनकर निर्णय तक पहुंचना पड़े!
सलाहकारों की जमात भी कम दिलचस्प नहीं होती। वह चाहती है कि नियंत्रण हमेशा उसके हाथ में रहे, भले ही उसकी एक-दो सलाह बीच रास्ते में दरकिनार ही क्यों न कर दी जाए। फिर भी घोषणा यही रहती है कि संगठनात्मक तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।
ऐसे में नई जिम्मेदारी पाने वालों के सामने असली चुनौती यही होगी कि कागज पर मिली जिम्मेदारी को जमीन पर संगठन की सक्रियता में कितना बदला जा सकता है। क्योंकि राजनीति में विरासत मिल सकती है, पद मिल सकता है और पहचान भी मिल सकती है—लेकिन जनता का भरोसा शायद ऐसी संपत्ति है, जिसकी कोई पारिवारिक रजिस्ट्री नहीं होती।
यह बात जरूर है—परिवार का भरोसा, रिश्तेदारी में परोसा!
संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
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