नहीं बना कोई स्मारक, न मिली स्थायी पहचान
सलेमपुर/देवरिया (राष्ट्र की परंपरा)।
जब पूरा भारत अंग्रेजी हुकूमत की जंजीरों को तोड़ने के लिए आंदोलनों की आग में जल रहा था, तब देवरिया जनपद की सलेमपुर तहसील भी पीछे नहीं रही। यहाँ के कई वीर सपूतों ने अपने प्राणों की परवाह न करते हुए स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। इन्हीं में एक नाम था—कपिलदेव सिंह, ग्राम लोहार बभनौली (पोस्ट–सोहनाग, तहसील–सलेमपुर) के निवासी।
चौरी चौरा के आंदोलन से जुड़ी थी उनकी आवाज़
कपिलदेव सिंह उन गिने-चुने सेनानियों में थे जिन्होंने चौरी चौरा जैसे ऐतिहासिक घटनास्थल से प्रेरणा लेकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। अपने साथियों संग उन्होंने अंग्रेजी दमन के खिलाफ मोर्चा खोला।
अंग्रेजी अदालत का फैसला और 7 वर्ष की कैद
अंग्रेज अफसरों को जब उनकी गतिविधियों का पता चला, तो उन्हें गिरफ्तार कर 29 अप्रैल 1940 को गोरखपुर न्यायालय में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें विभिन्न धाराओं में दोषी पाते हुए सात वर्ष की कठोर सजा सुनाई। इसके बाद उन्हें केंद्रीय कारागार वाराणसी भेजा गया, जहाँ उन्होंने जेल की यातनाएं सहीं। आखिरकार 11 अगस्त 1945 को उन्हें रिहा किया गया।
आजादी के बाद मिला दर्जा, लेकिन खो गई पहचान
आजादी के बाद सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा, ताम्र पत्र और कुछ सुविधाएं दीं। लेकिन समय बीतने के साथ उनका नाम और योगदान सरकारी फाइलों में दबकर रह गया। ना उनके नाम की कोई सड़क, न स्मारक, न ही विद्यालय का नामकरण—सब कुछ उपेक्षित।
जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की खामोशी
सवाल उठता है कि जब जिले में छोटे-छोटे कामों के लिए शिलापट्ट और स्मारक लगाए जाते हैं, तो ऐसे क्रांतिकारी के नाम पर स्मारक या सड़क क्यों नहीं? क्या जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को यह याद नहीं कि स्वतंत्रता किसी एक दिन का उपहार नहीं, बल्कि ऐसे सेनानियों के बलिदान की देन है?
विरासत को सहेजने की आवश्यकता
कपिलदेव सिंह जैसे क्रांतिकारियों की गाथा नई पीढ़ी तक पहुंचे, इसके लिए जिला प्रशासन को उनके नाम पर स्मारक, पुस्तकालय या विद्यालय का नामकरण करना चाहिए। समाज के हर वर्ग को भी इस मांग में आवाज़ मिलानी चाहिए, ताकि यह नारा साकार हो सके—
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”
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