फर्जी दुष्कर्म केस, ब्लैकमेलिंग और रंगदारी: गोरखपुर गोलीकांड की अंदरूनी कहानी

जब कानून के रखवाले भी फंसे जाल में: अंशिका सिंह केस का बड़ा खुलासा

गोरखपुर गोलीकांड: अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा का हनीट्रैप नेटवर्क, 150 से ज्यादा शिकार, पुलिसकर्मी भी फंसे


गोरखपुर गोलीकांड: सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सुनियोजित हनीट्रैप नेटवर्क की पूरी कहानी


गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) सिंघड़िया इलाके में निजी अस्पताल के मैनेजर पर हुई फायरिंग की घटना अब एक साधारण आपराधिक वारदात नहीं रह गई है। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा एक संगठित हनीट्रैप नेटवर्क, ब्लैकमेलिंग, फर्जी दुष्कर्म केस और रंगदारी के ऐसे मॉडल पर काम कर रही थी, जिसने बीते पांच वर्षों में करीब डेढ़ सौ लोगों को अपना शिकार बनाया।
इस पूरे मामले ने कानून व्यवस्था, सोशल मीडिया के दुरुपयोग और फर्जी मुकदमों की भयावह सच्चाई को उजागर कर दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क में आम नागरिक ही नहीं, बल्कि पुलिस विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी भी फंस चुके थे।

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सोशल मीडिया से शुरू होता था हनीट्रैप का जाल
पुलिस के अनुसार अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मैसेंजर ऐप्स के जरिए लोगों से दोस्ती करती थी। शुरुआत में बातचीत सामान्य रहती, लेकिन धीरे-धीरे वह वीडियो कॉल का सहारा लेती। इसी दौरान वह कॉल की रिकॉर्डिंग कर लेती थी।
बाद में यही रिकॉर्डिंग ब्लैकमेलिंग का हथियार बनती। पीड़ितों को दुष्कर्म, पॉक्सो एक्ट या छेड़छाड़ जैसे गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी दी जाती। डर और सामाजिक बदनामी के भय से कई लोग समझौते के नाम पर मोटी रकम देने को मजबूर हो जाते थे।

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2021 से शुरू हुआ उगाही का संगठित मॉडल
पुलिस जांच में सामने आया कि वर्ष 2021 में देवरिया निवासी राज विश्वकर्मा के खिलाफ दर्ज कराया गया मुकदमा इस नेटवर्क का पहला बड़ा मामला था। उस केस में दुष्कर्म, धमकी और पॉक्सो एक्ट जैसी गंभीर धाराएं लगाई गईं।
कुछ समय बाद सुलह के नाम पर लाखों रुपये की उगाही की गई। इसी मॉडल को अंशिका ने आगे भी अपनाया। जहां विरोध हुआ, वहां नए मुकदमे दर्ज कराने से वह पीछे नहीं हटी।
संतकबीरनगर से गोरखपुर तक फैला नेटवर्क
वर्ष 2023 में अंशिका संतकबीरनगर के खलीलाबाद क्षेत्र में किराए के मकान में रहने लगी। देर रात तक लड़कों के आने-जाने को लेकर जब मकान मालिक ने आपत्ति जताई तो उसने कमरा खाली करने के बदले दो लाख रुपये की मांग कर दी।
मकान मालिक द्वारा सीसीटीवी कैमरे लगवाने पर वह वहां से चली गई, लेकिन जाते-जाते धमकी और दबाव बनाने की कोशिश भी की। इसी दौरान खलीलाबाद और आसपास के इलाकों में कई लोगों पर मारपीट, धमकी और दुष्कर्म के आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराए गए।

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फर्जी मुकदमे और सुलह के नाम पर लाखों की वसूली
संतकबीरनगर के डीघा बाईपास निवासी सूरज सिंह समेत पांच लोगों पर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया। जब सुलह नहीं हुई तो दोबारा रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
खलीलाबाद निवासी प्रियांशु सिंह से भी फर्जी केस में फंसाने की धमकी देकर 50 हजार रुपये की उगाही की गई। पुलिस का मानना है कि ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं, जिनकी अभी शिकायत तक नहीं की गई।
जब पुलिसकर्मी भी बने शिकार
इस केस का सबसे गंभीर और चिंताजनक पहलू यह है कि अंशिका के जाल में पुलिस विभाग के लोग भी फंसे। जांच में खुलासा हुआ है कि मैसेंजर ऐप के जरिए उसने अयोध्या में तैनात एक सीओ सहित करीब 15 पुलिसकर्मियों से संपर्क साधा।
वीडियो कॉल रिकॉर्ड कर उन्हें दुष्कर्म के फर्जी केस में फंसाने की धमकी दी गई और मोटी रकम वसूली गई। गीडा थाने के एक उपनिरीक्षक से भी इसी तरह उगाही की गई। एक मामले में तो थाने में करीब पांच घंटे पंचायत चली और अंत में कैश व सोने की चेन देकर मामला दबाया गया।

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रंगदारी में चली गोली, मामला पहुंचा हिंसा तक
गोरखपुर के कैंट थाना क्षेत्र के सिंघड़िया चौराहे पर रंगदारी न मिलने पर अंशिका सिंह उर्फ अंतिमा ने निजी अस्पताल के मैनेजर विशाल मिश्रा पर पिस्टल तान दी।
विशाल के पीछे हटने पर चली गोली उसके दोस्त अमिताभ को जा लगी। यह घटना इस पूरे नेटवर्क का सबसे हिंसक रूप बनकर सामने आई। विशाल मिश्रा की तहरीर पर पुलिस ने अंशिका और उसके साथी बंटी उर्फ आकाश वर्मा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
पुलिस जांच और आगे की कार्रवाई
फिलहाल पुलिस अंशिका सिंह के मोबाइल, सोशल मीडिया अकाउंट, बैंक ट्रांजैक्शन और कॉल रिकॉर्ड खंगाल रही है। आशंका है कि इस नेटवर्क में और भी लोग शामिल हो सकते हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला फर्जी मुकदमों के दुरुपयोग, सोशल मीडिया से होने वाले अपराध और रंगदारी के नए स्वरूप को उजागर करता है। आने वाले दिनों में और बड़े खुलासे संभव हैं।

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समाज और सिस्टम के लिए बड़ा सबक
यह मामला सिर्फ एक आरोपी की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे तकनीक, कानून के डर और सामाजिक बदनामी का इस्तेमाल कर संगठित अपराध खड़ा किया जा सकता है।
फर्जी केसों से जहां निर्दोष लोगों की जिंदगी तबाह होती है, वहीं असली पीड़ितों के मामलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं। पुलिस और न्याय व्यवस्था के लिए यह केस एक बड़ी चुनौती और चेतावनी दोनों है।

Editor CP pandey

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