Thursday, January 15, 2026
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आस्था ही भारत की आत्मा, विश्वास ही उसकी पहचान

कैलाश सिंह
महाराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक चेतना की वह जीवंत प्रयोगशाला है, जिसने सदियों से मानवता को जीने की दिशा दी है। यहां धर्म किसी टकराव का कारण नहीं, बल्कि जीवन को जोड़ने वाला सूत्र रहा है। यही कारण है कि भारत को समझने के लिए उसके नक्शे से ज्यादा उसके मन को पढ़ना पड़ता है।
भारतीय सभ्यता की नींव आस्था पर टिकी है। यहां नदियां सिर्फ बहती जल धाराएं नहीं, बल्कि श्रद्धा की धमनियां हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों ने न केवल खेतों को सींचा, बल्कि पीढ़ियों को संस्कार भी दिए। जब कोई समाज प्रकृति को पूज्य मान ले, तो वह उसके संरक्षण का दायित्व भी स्वयं उठा लेता है—और यही भारत की मूल सोच रही है।
भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सांस्कृतिक सहिष्णुता है। दीपावली, होली, ईद, गुरुपर्व और क्रिसमस जैसे पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता के उत्सव हैं। विविधताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना भारत की आत्मा में बसा है। यही वह दृष्टि है, जो अनेकता में एकता को नारा नहीं, व्यवहार बनाती है। देश के कोने-कोने में फैले तीर्थस्थल—अयोध्या, काशी, मथुरा, हरिद्वार, अजमेर शरीफ, अमृतसर और बोधगया—सिर्फ पूजा के केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के स्तंभ हैं। इन स्थलों पर आकर श्रद्धालु धर्म नहीं पूछता, शांति खोजता है। यही भारत की आस्था को वैश्विक बनाती है।आधुनिक युग में, जब विज्ञान और तकनीक जीवन की गति तय कर रहे हैं, तब भी भारत की आस्था कमजोर नहीं पड़ी। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्चों में आज भी उतनी ही श्रद्धा से शीश झुकते हैं। यह संकेत है कि भारत में आस्था अंधविश्वास नहीं, बल्कि आत्मिक संबल है—जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है।
भारत की वास्तविक शक्ति उसके संसाधनों, हथियारों या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास है—वह विश्वास जिसने गुलामी के दौर में आत्मसम्मान बचाए रखा, जिसने विभाजन के घावों के बावजूद देश को जोड़े रखा और जिसने हर आपदा में समाज को एक-दूसरे के साथ खड़ा किया।
आज जब दुनिया संघर्ष, असहिष्णुता और तनाव से जूझ रही है, भारत की आस्था- आधारित जीवन दृष्टि वैश्विक समाज को शांति का रास्ता दिखा सकती है। यही भारत का वैश्विक दायित्व भी है।भारत केवल मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों का देश नहीं,यह उन दिलों का देश है जहां ईश्वर विश्वास बनकर बसता है।और शायद इसी विश्वास के कारण भारत सिर्फ एक राष्ट्र नहीं,बल्कि एक निरंतर चलती आध्यात्मिक यात्रा है।

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