कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। ऊर्जा आधुनिक जीवन की रीढ़ है। बिजली, ईंधन और अन्य ऊर्जा स्रोतों के बिना विकास, उद्योग, कृषि और आम जनजीवन की कल्पना भी अधूरी है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या, तेज़ी से हो रहा शहरीकरण और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति ने ऊर्जा संसाधनों पर गंभीर दबाव बना दिया है। ऐसे में ऊर्जा संरक्षण अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
भारत जैसे विकासशील देश में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। कोयला, पेट्रोलियम और गैस जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत सीमित हैं, जबकि इनके अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। यदि आज ऊर्जा के विवेकपूर्ण उपयोग पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाला समय ऊर्जा संकट से जूझ सकता है।
ऊर्जा संरक्षण का अर्थ केवल ऊर्जा की खपत कम करना नहीं, बल्कि ऊर्जा का स्मार्ट और कुशल उपयोग करना है। अनावश्यक बिजली खर्च, पुराने ऊर्जा-अपव्ययी उपकरणों का प्रयोग और ईंधन की बर्बादी भविष्य के लिए खतरा बन रही है। वहीं, छोटी-छोटी आदतें—जैसे बेवजह लाइट बंद रखना, ऊर्जा दक्ष उपकरण अपनाना और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग—बड़े स्तर पर सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।
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सरकार द्वारा सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देने के प्रयास सराहनीय हैं। ये न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं, बल्कि देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर भी ले जा रहे हैं। हालांकि, केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। जब तक आम नागरिक ऊर्जा संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी नहीं बनाएगा, तब तक लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता।
ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा और बायोगैस योजनाएं आत्मनिर्भरता का माध्यम बन सकती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्ष भवन और स्मार्ट ऊर्जा प्रबंधन को प्राथमिकता देना आवश्यक है। साथ ही उद्योगों को भी उत्पादन के साथ-साथ ऊर्जा बचत को अपनी नीति का हिस्सा बनाना होगा।
ऊर्जा संरक्षण आज इसलिए जरूरी है क्योंकि यही कल की सुरक्षा की गारंटी है। यह आर्थिक मजबूती, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की नींव रखता है। अब समय आ गया है कि ऊर्जा को केवल संसाधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की धरोहर समझा जाए।
ऊर्जा बचेगी, तभी भविष्य सुरक्षित रहेगा और विकास की रोशनी हर घर तक पहुंचेगी।
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