महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद महराजगंज की धरती गुरुवार को गहरे शोक में डूबी नजर आई। शिक्षा को मिशन मानकर सैकड़ों बच्चों का भविष्य संवारने वाले अनूप पब्लिक स्कूल के प्रबंधक एवं प्रख्यात शिक्षाविद् अनूप चौधरी (40 वर्ष) का असामयिक निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे जिले का शिक्षा जगत स्तब्ध है और हर आंख नम हो गई है।
अनूप चौधरी का जाना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि उस सोच और समर्पण का अचानक थम जाना है, जिसने शिक्षा को व्यवसाय नहीं बल्कि सेवा का माध्यम बनाया। उन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा की ज्योत जलाए रखी और सैकड़ों बच्चों को आगे बढ़ने का मार्ग दिखाया।
साधारण शुरुआत से असाधारण पहचान तक
फरेंदा नगर में एक छोटे से कोचिंग सेंटर से शुरू हुआ उनका सफर संघर्ष, मेहनत और संकल्प की मिसाल रहा। उन्होंने शिक्षा को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे संस्कार, अनुशासन और आत्मविश्वास से जोड़ा। यही विचार आगे चलकर अनूप पब्लिक स्कूल की स्थापना का आधार बना, जो आज महराजगंज में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का प्रतीक बन चुका है।
छात्रों के लिए अभिभावक और मार्गदर्शक
अनूप चौधरी छात्रों के लिए केवल प्रबंधक नहीं, बल्कि एक सच्चे अभिभावक और प्रेरणास्रोत थे। विद्यार्थियों की छोटी से छोटी समस्या को भी वे गंभीरता से लेते थे। उनके मार्गदर्शन में कई छात्रों ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की और आज वे अपने प्रिय शिक्षक को नम आंखों से याद कर रहे हैं।
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बीमारी के बाद हुआ असामयिक निधन
परिजनों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी। बुधवार रात अचानक हालत बिगड़ने पर उन्हें गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां गुरुवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब
निधन की सूचना मिलते ही विद्यालय परिसर, उनके आवास और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई। शिक्षक, छात्र, अभिभावक, सामाजिक कार्यकर्ता और जनप्रतिनिधि बड़ी संख्या में अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे।
गुरुवार को उनकी अंतिम यात्रा कैंपियरगंज स्थित कर्मैनी घाट के लिए निकली। अंतिम संस्कार के दौरान माहौल बेहद गमगीन रहा। हर किसी की जुबान पर एक ही बात थी—अनूप चौधरी का जाना शिक्षा जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।
शिक्षा का दीप हमेशा जलता रहेगा
भले ही अनूप चौधरी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनके संस्कार और उनके द्वारा जलाया गया शिक्षा का दीप आने वाली पीढ़ियों को सदैव रोशनी देता रहेगा। महराजगंज में शिक्षा की अलख भले ही आज कुछ देर के लिए मंद पड़ी हो, लेकिन उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।
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