मेरी कविता
प्रभुता पाई काहि न मद होई,
प्रतिभा पाई सदा यश होई,
असफलता से बात न बनती,
पाई सफलता आराम न होई।
भाग्य से मिली सफलता कैसी,
बिन गुरू ज्ञान की प्रतिभा जैसी ।
मिले न प्रतिभा बिन अवसर के,
निज कृत क़र्म जीवन की जैसी ।
सुंदर संदेश छिपा कविता में,
जीवन की राहों में जो कंटक,
राह कंटकों की भी फूलों जैसी
एहसास यही देता यह सबक़ ।
श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीताज्ञान
दिया, जिसको पाकर अर्जुन को,
महाभारत का संग्राम भी सहज ही
रुचिकर व आसान लगने लगा था।
वरना अर्जुन सारा राज पाट त्याग
एक सन्यासी योगी बन जाना था ।
श्रीकृष्ण की प्रभुता भी प्रतिभा थी,
सफलता पार्थ के चरण चूमती थी ।
आदित्य कविता का अप्रतिम प्रेम
राधा जी के श्री कृष्ण जी के प्रति
प्रेम रोग को भी पीछे छोड़ चुका है
राधा-कृष्ण प्रेम तो जग ज़ाहिर है।
•कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
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