रोग केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं।

आओ रोगों से जूझ रहे लोगों के प्रति सहानुभूति रखें उन्हें जीवनशैली सुधारने को प्रेरित करें और स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए समाज को बेहतर दिशा दें -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आधुनिक मानव सभ्यता आज जिस डिजिटल और प्रौद्योगिकीय उन्नति के शिखर पर खड़ी है, उसे देखते हुए यह मानना स्वाभाविक लगता है कि विज्ञान की शक्ति ने दुनियाँ को लगभग हर समस्या का समाधान देना शुरू कर दिया होगा।कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स क्वांटम कंप्यूटिंग और जेनेटिक एडिटिंग जैसी तकनीकों ने हमारे जीवन को जितना सरल बनाया है, उतनी ही आशाएं भी जगाई हैं। किंतु, विरोधाभास यह है कि इस टेक्नोलॉजी-प्रधान सामयिक दुनियाँ में भी पृथ्वी के प्रत्येक देश को अनेक प्रकार की बीमारियाँ चुनौती के रूप में घेरे हुए हैं। अनेक रोग ऐसे हैं जिनके उपचार में उल्लेखनीय प्रगति हुई है,परंतु अब भी कई बीमारियाँ मनुष्य और चिकित्सा जगत के लिए पहेली समान बनी हुई हैं। यह परिघटना न केवल चिकित्सा प्रणाली को निरंतर विकसित होने का संदेश देती है,बल्कि यह भी दर्शाती है कि रोगों के विरुद्ध अंतिम जीत अभी दूर है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि दुनियाँ भर में आज भी लाखों लोग उन बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं,जो या तो लाइलाज हैं या जिनका उपचार कठिन, महंगा और अत्यंत जटिल है। ऐसे रोग केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं। कैंसर इसका प्रमुख उदाहरण है,एक ऐसी बीमारी जिसकी तीव्रता और विस्फोटक विस्तार आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए आज भी अत्यंत बड़ी चुनौती बना हुआ है। कैंसर के अनेक प्रकार,उनकीविविधतापूर्ण प्रकृति और तेजी से फैलने वाले स्वरूप ने यह सिद्ध कर दिया है कि रोगों से लड़ाई विज्ञान और समाज दोनों स्तरों पर बराबर की लड़ाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दशक में कैंसर के मामलों में असाधारण वृद्धि हुई है, जो यह दर्शाती है कि आधुनिक जीवनशैली और पर्यावरणीय परिवर्तन भी इस रोग के कारकों को बढ़ावा दे रहे हैं। आज हम बीमारियों पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इसी संदर्भ में, 17 नवंबर 2025 को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय मिर्गी दिवस(नेशनल एपिलेपसी डे) अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर बन जाता है।मिर्गी (एपिलेपसी) एक ऐसा न्यूरोलॉजिकल विकार है जो विश्व की लगभग 5 करोड़ आबादी को प्रभावित करता है, और यह आंकड़ा इसे दुनियाँ के सर्वाधिक सामान्यन्यूरोलॉजिकल विकारों में शामिल करता है। इस विकार से पीड़ित लोगों को सामाजिक भेदभाव, गलत धारणाओं और असमंजस का सामना करना पड़ता है। बता दें सबसे पहले यह माना जाता है की यह एक संक्रामक बीमारी है जिस कारण मरीज की कोई सहायता करने से भी डरता है लेकिन यह एक असंक्रामक बीमारी है और हमारे अंदर नहीं फैल सकती है। दूसरी अफवाह यह है की अगर किसी को दौरे पड़ रहे हैं तो उसे भूत प्रेत और जादू टोने से जोड़ दिया जाता है जो पूरी तरह से झूठ है। मिर्गी के मरीज को जूता सुंघाना, उसके मुंह में चम्मच डालना भी आधार रहित बातें हैँ,ऐसे में जागरूकता, स्वीकार्यता और वैज्ञानिक जानकारी ही वह हथियार है जो मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति के जीवन को बेहतर, सुरक्षित और सम्मानजनक बना सकता है।

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साथियों बात अगर हम राष्ट्रीय मिर्गी दिवस क़े मुख्य उद्देश्य को समझने की करें तो, लोगों को यह समझाना हैं कि मिर्गी कोई अलौकिक घटना नहीं, बल्कि मस्तिष्क का चिकित्सकीय विकार है; इसका इलाज मौजूद है; और सही देखभाल तथा जागरूकता से व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। इस दिवस पर चिकित्सा जगत, समाज और सरकारें मिलकर एक संगठित अभियान के माध्यम से मिर्गी को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करती हैं। यह संदेश दुनिया के हर देश के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बीमारियों और विकारों का मानव जीवन पर प्रभाव सीमाओं को पार कर वैश्विक स्वरूप धारण करता है।

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साथियों बात अगर हम जीवनशैली में परिवर्तन, रोग को बढ़ावा देने वाले कारकों से बचाव को समझने की करें तो रोगों के उपचार में केवल दवाइयाँ और चिकित्सा हस्तक्षेप ही पर्याप्त नहीं होते;जीवनशैली में परिवर्तन रोग को बढ़ावा देने वाले कारकों से बचाव, मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान तथा नियमित दिनचर्या स्वास्थ्य को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। कई बीमारियाँ ऐसी होती हैं जिनका प्रमुख कारण अनुचित जीवनशैली, असंतुलित आहार, तनाव, पर्यावरणीय प्रदूषण और गतिहीन दिनचर्या होती है। विश्वभर में अध्ययन यह दर्शाते हैं कि एक बड़ी संख्या उन रोगों की है जिनका प्रतिशत केवल जीवनशैली सुधार, जैसे स्वस्थ भोजन,नियमित व्यायाम,पर्याप्त नींद,मानसिक संतुलन औरतनाव प्रबंधन से कम किया जा सकता है। मिर्गी के संदर्भ में भी यह पूर्णत: सत्य है। मिर्गी का दौरा कई बार नींद की कमी, तेज़ रोशनी, दिमागी तनाव, शराब सेवन या दवाई छोड़ देने से ट्रिगर हो जाता है। इसलिए, रोग की समझ और जीवनशैली का अनुशासन व्यक्ति को सुरक्षित रखने का सबसे विश्वसनीय तरीका है।जीवनशैली सुधार के अतिरिक्त, जागरूकता वह सटीक और शक्तिशाली अस्त्र है जो रोगों की रोकथाम, उपचार और प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभाता है। दुनिया के अनेक देशों में स्वास्थ्य से संबंधित जागरूकता अभियानों ने लाखों लोगों की जान बचाई है। पोलियो, एड्स, क्षयरोग और कोविड-19 जैसी बड़ी महामारियों के दौरान भी जागरूकता ने निर्णायक भूमिका निभाई। रोग को समझना, लक्षणों को पहचानना, उपचार को जानना और गलत धारणाओं से दूर रहना,ये सभी बातें व्यक्ति को बीमारी से बचाने में उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी आधुनिक दवाइयाँ और तकनीक।

साथियों बात अगर हम आज डिजिटल मीडिया, इंटरनेट और शिक्षा के विस्तार के कारण स्वास्थ्य से संबंधित लाभ हानि को समझने की करें तो,जानकारी पहले की तुलना में कहीं अधिक सुलभ हो गई है। किंतु इसके साथ ही गलत सूचनाओं का प्रसार भी उतनी ही तेजी से हुआ है। ऐसे में वास्तविक,वैज्ञानिक और सत्य आधारित जानकारी लोगों तक पहुँचना बेहद आवश्यक हो गया है। मिर्गी जैसे विकारों को लेकर अभी भी विभिन्न देशों में मिथक और अंधविश्वास फैले हुए हैं। कुछ लोग इसे दैवी या अलौकिक घटना समझते हैं, कुछ इसे मानसिक कमजोरी से जोड़ते हैं और कुछ इसे सामाजिक कलंक की तरह देखते हैं। इस सोच को बदलने का एकमात्र तरीका है, जागरूकता, संवाद और सटीक सूचना का प्रसार। 

साथियों बातअगर हम विश्व के कई देशों में ऐसे रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसको समझने की करें तो उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में समान अवसर नहीं मिल पाते। यह स्थिति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक विकास में भी बड़ी बाधा बनती है। इसलिए, विकारों को त्यागने का संदेश और सामाजिक स्वीकार्यता आज के स्वास्थ्य विमर्श का अत्यंत आवश्यक हिस्सा है। मिर्गी, कैंसर या किसी भी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को सहानुभूति, सम्मान और सहयोग की आवश्यकता होती है,न कि भेदभाव, दूरी या भय की। यदि सामाजिक रूप से स्वस्थ वातावरण उपलब्ध हो, तो बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति पुनर्वास और सुधार की दिशा में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकता है।यह भी स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य केवलचिकित्सा प्रणाली का विषय नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक संरचना का हिस्सा है। बीमारियों से लड़ाई तभी सफल हो सकती है जब सरकारें, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सामाजिक संस्थाएँ, स्कूल, मीडिया और आम नागरिक मिलकर एक वैश्विक प्रयास करें। इस संदर्भ में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, रेड क्रॉस जैसी संस्थाएँ दुनिया के विभिन्न देशों में बीमारियों के प्रति जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने में निरंतर कार्यरत हैं।

साथियों बात अगर हम इस तथ्य को समझने की करें कि  आज की दुनियाँ में यह आवश्यक है कि हम बीमारी को केवल चिकित्सा दृष्टि से नहीं,बल्कि एक समग्र सामाजिक -मानवीय दृष्टि से देखें। रोगों से पीड़ित लोगों की संख्या तब ही कम होगी जब समाज के प्रत्येक व्यक्ति में जागरूकता का विस्तार होगा, जीवनशैली में सुधार आएगा और बीमारियों के विरुद्ध सामूहिक प्रयास होंगे। हमें यह समझना होगा कि कोई भी रोग किसी एक व्यक्ति, परिवार या देश की समस्या नहीं है; यह संपूर्ण मानवता की साझा चुनौती है।इसीलिए, 17 नवंबर 2025 का राष्ट्रीय मिर्गी दिवस केवल भारत का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक वैश्विक संदेश है,कि बीमारियों और विकारों से लड़ाई में जागरूकता, सहानुभूति, विज्ञान और उचित जीवनशैली को अपनाना ही सबसे प्रभावी रास्ता है। यह दिन न केवल मिर्गी के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर है, बल्कि आधुनिक दुनिया को यह याद दिलाने का भी मंच है कि जब तक मानवता के किसी भी हिस्से में कोई व्यक्ति किसी रोग से पीड़ित है, तब तक हमारी जिम्मेदारी नहीं होती।

अंतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह समझना आवश्यक है कि आधुनिक तकनीक,चिकित्सा विज्ञान, सामाजिक जागरूकता और मानवीय सहयोग मिलकर ही एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर सकते हैं जहाँ रोग केवल उपचार का विषय न हो,बल्कि रोकथाम, जागरूकता और संवेदना के साथ नियंत्रित हो सके। हम सभी का दायित्व है कि रोगों से जूझ रहे लोगों के प्रति सहानुभूति रखें,उन्हें सही जानकारी दें,जीवनशैली सुधारने को प्रेरित करें और स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए समाज को बेहतर दिशा दें। यही आधुनिक, संवेदनशील और स्वास्थ्य- सुरक्षित विश्व की वास्तविक पहचान है।

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

Editor CP pandey

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