रिश्तों में रूठापन हो,
बातों में तल्ख़ी आती है,
दिल के किसी कोने में
मिलने की आस जगाती है।
राखी केवल धागा नहीं,
विश्वास और सम्मान है,
दूर भले हों रिश्ते लेकिन
मन में फिर भी अपनापन है।
मतभेद रहें विचारों में,
मन में द्वेष न पालें हम,
शब्दों से जब पुल बन सकते,
क्यों दीवारें डालें हम?
सत्ता हो या सामान्य जीवन,
अलग-अलग हो सकती राय,
पर संवाद का दीपक हरदम
अंधियारे में राह दिखाए।
कड़वे बोलों के मौसम में
मिठास भी ज़रूरी है,
रिश्ते बचाने की खातिर
कभी झुकना भी मजबूरी है।
राखी का संदेश यही है—
मन से मन की दूरी घटे,
विचार भले ही अलग रहें,
पर संवाद कभी न हमसे छूटे।
— संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इन्दौर, मध्य प्रदेश
स्व-रचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
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