विकास बनाम विनाश: पेड़ों पर कुल्हाड़ी, मानव भविष्य पर संकट

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। विकास की अंधी दौड़ में मानव ने सबसे पहले जिस पर प्रहार किया है, वह है प्रकृति और उसके प्रहरी—पेड़। सड़क, भवन, उद्योग, खनन और तथाकथित आधुनिक परियोजनाओं के नाम पर हर दिन हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। इस हरियाली के विनाश को विकास का नाम दिया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि मानव स्वयं अपने अस्तित्व की जड़ें काट रहा है।
पेड़ केवल छाया देने या लकड़ी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के रक्षक हैं। शुद्ध वायु, संतुलित वर्षा, भूजल संरक्षण और उपजाऊ धरती—इन सभी के मूल में वृक्ष ही हैं। लेकिन जब जंगल उजड़ते हैं और हरियाली मिटती है, तो उसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ता है। तापमान में लगातार वृद्धि, अनियमित वर्षा, सूखा और गहराता जल संकट इसी अदूरदर्शी विकास का परिणाम है।
शहरों में घटते हरित क्षेत्र और ग्रामीण इलाकों में तेजी से हो रहा जंगलों का सफाया इस बात का प्रमाण है कि विकास की योजनाओं में पर्यावरण को सबसे पीछे धकेल दिया गया है। चौड़ी सड़कों और कंक्रीट के जंगलों ने प्राकृतिक हरियाली को निगल लिया है। नतीजा यह है कि वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है और दमा, एलर्जी व सांस संबंधी बीमारियां आम होती जा रही हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वृक्ष कटान पर समय रहते प्रभावी रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों को भयावह परिणाम भुगतने पड़ेंगे। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और जैव विविधता का ह्रास मानव जीवन को असुरक्षित बना देगा। यह विडंबना ही है कि जिस विकास को मानव अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है, वही विकास उसके भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
अब समय आ गया है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करें। प्रत्येक विकास परियोजना में वृक्ष संरक्षण और व्यापक वृक्षारोपण को अनिवार्य बनाया जाए। साथ ही आम नागरिकों को भी यह समझना होगा कि एक पेड़ बचाना केवल प्रकृति की रक्षा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन की सुरक्षा है।
यदि आज पेड़ों को नहीं बचाया गया, तो कल मानव को बचाना कठिन हो जाएगा। विकास की असली परिभाषा वही है, जो प्रकृति को साथ लेकर चले—अन्यथा पेड़ों पर किया गया हर वार, मानव के भविष्य पर किया गया प्रहार सिद्ध होगा।

rkpNavneet Mishra

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