नाराज़गी दिव्यांग मतदाताओं को सुविधाओं की कमी, आयोग के आदेशों पर उठे सवाल
रोड नहीं तो वोट नहीं” – विकास की अनदेखी पर गांवों ने जताई
पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)।बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण की वोटिंग गुरुवार को 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर पूरी हुई। सुबह से ही मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की लंबी कतारें नजर आईं। महिलाओं और युवाओं ने बढ़-चढ़कर मतदान किया, जिससे लोकतंत्र की जड़ों की मजबूती एक बार फिर दिखी।
हालांकि, लोकतांत्रिक जोश के बीच कुछ इलाकों से मतदान बहिष्कार, EVM खराबी और दिव्यांग मतदाताओं को सुविधा न मिलने की शिकायतें भी सामने आईं। कुल मिलाकर चुनाव आयोग की सख्त निगरानी में मतदान शांतिपूर्ण माना गया, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक लापरवाहियों ने आयोग की तैयारियों पर सवाल उठाए हैं।
विकास कार्यों की अनदेखी पर ग्रामीणों का गुस्सा पहले चरण में कई इलाकों में ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार किया।
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दरभंगा के कुशेश्वरस्थान में सुघराईन गांव के लोगों ने सड़क न बनने पर “रोड नहीं तो वोट नहीं” का नारा बुलंद किया।
पटना के फतुहा विधानसभा क्षेत्र में ज़मीन विवाद के कारण पूरा गांव मतदान से दूर रहा।
सोनवर्षा के जमालनगर में ग्रामीणों ने विकास कार्यों की अनदेखी पर विरोध दर्ज कराया।
मुजफ्फरपुर के गायघाट विधानसभा के तीन बूथों (161, 162, 170) पर पुल और सड़क निर्माण में देरी के कारण ग्रामीणों ने वोट डालने से इंकार किया।
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इन बहिष्कारों ने चुनावी प्रक्रिया में जनता की नाराज़गी और विकास की मांग को मुखर रूप में सामने रखा।
मतदान केंद्रों पर घटनाएं और लापरवाही
पटना के हाजीपुर गांव में बूथ नंबर 254 पर ड्यूटी के दौरान पीठासीन अधिकारी राजेश की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें तत्काल स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां उनका ब्लड प्रेशर अधिक पाया गया।
बिहार शरीफ में बीजेपी के चार कार्यकर्ताओं को पर्चियां बांटने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया, जिससे RJD और BJP कार्यकर्ताओं के बीच तनाव की स्थिति बनी।
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पटना साहिब सीट पर विधानसभा अध्यक्ष और बीजेपी विधायक नंदकिशोर यादव और मतदानकर्मियों के बीच वोटर कार्ड दिखाने को लेकर हुई नोकझोंक भी चर्चा का विषय रही।
दिव्यांग मतदाताओं की उपेक्षा
नालंदा जिले के हिलसा विधानसभा क्षेत्र में बूथ नंबर 297 और 298 पर दिव्यांग मतदाताओं को व्हीलचेयर जैसी बुनियादी सुविधा नहीं मिली। चुनाव आयोग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद ऐसी लापरवाही ने प्रशासनिक असंवेदनशीलता को उजागर किया। कई दिव्यांग मतदाताओं को लाइन में लगकर घंटों इंतजार करना पड़ा।
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लोकतंत्र में जनता का भरोसा कायम
इन सबके बीच सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि बिहार का मतदाता आज भी लोकतंत्र पर विश्वास रखता है। चुनौतियों, असुविधाओं और उपेक्षा के बावजूद मतदाता वोट डालने निकले। कई जिलों में मतदान का प्रतिशत 60 से अधिक रहा, जो लोकतांत्रिक चेतना की जीवंत मिसाल है।
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पहले चरण की वोटिंग ने यह दिखा दिया कि बिहार के मतदाता केवल वोट नहीं डालते — वे व्यवस्था को आईना भी दिखाते हैं। उन्हें चाहिए एक संवेदनशील प्रशासन, भरोसेमंद व्यवस्था और जवाबदेह नेतृत्व।
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