महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। कभी घरों की मुंडेर, आंगन और खलिहानों में सुबह की पहली किरण के साथ चहचहाने वाली गौरैया अब खामोश होती जा रही है। बदलते परिवेश, बढ़ते कंक्रीट के जंगल और प्रकृति से दूरी ने इस नन्ही चिड़िया का संसार सिमटा दिया है।
क्यों घट रही है गौरैया की संख्या?
पक्के मकान और बंद संरचनाएं: पुराने कच्चे घर, छप्पर और खुली मुंडेरें अब सीमेंट-कंक्रीट की इमारतों में बदल गई हैं, जहां घोंसला बनाने की जगह नहीं बची।
पेड़ों और झाड़ियों की कटाई: प्राकृतिक आश्रय स्थल खत्म होते जा रहे हैं।
रासायनिक खाद व कीटनाशक: खेती में रसायनों के बढ़ते उपयोग से कीट-पतंगे कम हो रहे हैं, जो गौरैया का मुख्य भोजन हैं।
मोबाइल टावर विकिरण पर चिंता: विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक विकिरण पक्षियों के प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि घर-आंगन की जीवंतता और पारिस्थितिक संतुलन का प्रतीक है।
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क्या कर सकते हैं हम?
• घर की बालकनी या छत पर दाना-पानी रखें
• कृत्रिम घोंसले (Nest Box) लगाएं
• आसपास पेड़-पौधे रोपें
• रासायनिक कीटनाशकों का सीमित उपयोग करें
• बच्चों को पक्षी संरक्षण के प्रति जागरूक करें
छोटे-छोटे प्रयास इस नन्ही मेहमान की वापसी का रास्ता बना सकते हैं।
भावनात्मक जुड़ाव और पर्यावरणीय संदेश
गौरैया की अनुपस्थिति हमें यह एहसास दिलाती है कि हम प्रकृति से कितनी तेजी से दूर हो रहे हैं। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इसकी चहचहाहट को केवल कहानियों और तस्वीरों में ही जान पाएंगी।
अगर आंगन की रौनक बचानी है, तो गौरैया को बचाना होगा।
गौरैया बचेगी, तभी प्रकृति की मुस्कान और बचपन की यादें जिंदा रहेंगी।
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