250 साल पुराने अक्षयवट के दर्शन: एक अद्भुत अनुभव

  • रंजना द्विवेदी

अपने सौभाग्य को कैसे भूल सकती हूँ। जब कल चलते-चलते 250 वर्ष पुराने अक्षयवट के दर्शन हुए। बचपन से माँ को वटवृक्ष की पूजा करते देखती आई हूँ और वट सावित्री पूजा के दिन एक दिन पहले इस अद्भुत वटवृक्ष का आशीष मिलना मेरे लिए बहुत खास है।
सन् 1984 की बात है, ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान पापा की सेना की टुकड़ी पंजाब के लिए रवाना हो रही थी। उसी दिन वट सावित्री पूजा थी, और माँ ने जल्दी-जल्दी पूजा की और पापा को सेना की टुकड़ी के साथ जो भी प्रसाद तैयार था के साथ भेजा। हर बरगदाही पर यह किस्सा याद आ जाता है।
राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र में स्थित सिद्धपीठ मां चंद्रिका देवी से ढाई किलोमीटर दूर पर मंझी गांव में हरिवंश बाबा अक्षय वट आश्रम है। यहीं पर 300 साल पहले हरिवंश बाबा तपस्या करते थे। बचपन में ही उनके माता-पिता का साया उनके सिर के ऊपर से उठ गया था। इसके बाद वह घनघोर तपस्या में लीन हो गए थे। वह चंद्रिका देवी मां की बड़े भक्त थे और उनके रोजाना दर्शन करते थे। जब वह बुजुर्ग हो गए तो वह मंदिर नहीं जा पाते थे। ऐसी मान्यता है कि चंद्रिका देवी मां ने उनको वहां साक्षात दर्शन देकर कहा था कि तुम मेरी पूजा आराधना यहीं से करो तो हरिवंश बाबा ने वहीं से तपस्या करना शुरू कर दी थी। इसके बाद उन्होंने जीवित ही यहीं पर समाधि ले ली थी। माना जाता है कि यहीं से अक्षयवट का जन्म हुआ था।


अक्षयवट के दर्शन करने के बाद, मैंने वहां के वातावरण को महसूस किया। नियमित यज्ञ होता है, प्रसाद और फूल की दुकानें हैं और वट सावित्री व्रत का मेला भी लगता है। ऊंट की सवारी भी उपलब्ध है, और पेड़ को नुकसान पहुंचाने वालों पर जुर्माना लगाया जाता है। आम के बाग में कच्चे पक्के आम खरीदे गए और जायकेदार चाय का सेवन किया गया। कुल मिलाकर तीन चार घंटे प्रकृति का भरपूर आनंद लिया गया।
( लखनऊ निवासी लेखिका का संस्मरण और आंखों-देखी ।)

rkpnews@desk

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