डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान वह आधार है, जिस पर शासन, अधिकार और कर्तव्यों की पूरी इमारत खड़ी होती है। संविधान मानव द्वारा रचित नियमों का सुव्यवस्थित संग्रह है, जो समाज में व्यवस्था,समानता और न्याय सुनिश्चित करता है। इसके अनुच्छेद हमें बताते हैं कि राज्य कैसे चलेगा, नागरिकों के अधिकार क्या होंगे और सत्ता की सीमाएं कहां तक होंगी। वहीं दूसरी ओर परमात्मा किसी लिखित ग्रंथ या अनुच्छेद में सीमित नहीं हैं। परमात्मा नैतिकता का वह शाश्वत स्रोत हैं, जो मानव के विवेक, करुणा और आत्मबोध को दिशा देता है। सत्य, अहिंसा,दया, परोपकार और सह-अस्तित्व जैसे मूल्य किसी कानून के डर से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की पुकार से जन्म लेते हैं।
संविधान हमें यह सिखाता है कि क्या करना अनिवार्य है और क्या निषिद्ध, जबकि परमात्मा यह बोध कराते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। कानून अपराध के बाद दंड देता है, लेकिन नैतिकता अपराध से पहले ही मनुष्य को रोक लेती है। यही दोनों के बीच मूल अंतर और पूरकता है।
एक आदर्श समाज वही होता है जहां संविधान का पालन भय से नहीं, बल्कि नैतिक चेतना से किया जाए। जब कानून और नैतिकता साथ चलते हैं, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है। संविधान समाज को अनुशासित करता है और परमात्मा उसे संवेदनशील बनाते हैं। दोनों का संतुलन ही मानवता की सच्ची कसौटी है।
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