स्मारक सिक्कों से झलकता है प्राचीन भारत का राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर में आयोजित “प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं–अभिरुचि कार्यशाला” के अंतर्गत छठे व्याख्यान में प्राचीन भारत के स्मारक सिक्कों के माध्यम से राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास की गहराई से व्याख्या की गई। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के आचार्य प्रो. प्रशान्त श्रीवास्तव ने “प्राचीन भारत में स्मारक सिक्के” विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि ये सिक्के केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं थे, बल्कि सत्ता, स्मृति और संस्कृति के प्रतीक भी थे।
उन्होंने बताया कि भारत में स्मारक सिक्कों की परंपरा इण्डो-ग्रीक शासकों के समय से दिखाई देती है। इन सिक्कों का उद्देश्य महत्वपूर्ण घटनाओं, पूर्वजों और पूर्व शासकों की स्मृति को स्थायी रूप देना था। प्रो. श्रीवास्तव के अनुसार, डायोडोटस की स्मृति में जारी सिक्कों को प्रथम स्मृति सिक्का माना जाता है। आगाथोक्लिज द्वारा छह राजाओं की स्मृति में जारी सिक्के इस परंपरा को और मजबूत करते हैं।

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व्याख्यान में यह भी बताया गया कि सिकन्दर के काल से राजतत्व के प्रतीक के रूप में सिर पर डायडन अथवा फीता बांधने की परंपरा सिक्कों पर अंकित चित्रों से प्रमाणित होती है। प्लेटो के सिक्कों पर सूर्य देव के ग्रीक स्वरूप हेलियोस का अंकन उस समय की धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं को दर्शाता है। कुषाण काल में कुजुल कदफिसस के स्मारक सिक्के विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिनसे सत्ता विस्तार और सांस्कृतिक समन्वय की झलक मिलती है।
गुप्त काल को भारतीय मुद्रा इतिहास का स्वर्णयुग माना जाता है। इस काल में कुमारदेवी प्रकार तथा समुद्रगुप्त का अश्वमेध प्रकार सिक्का स्मारक सिक्कों के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। कुछ विद्वान गुप्तकालीन काच प्रकार और कुमारगुप्त प्रथम के अप्रतिघ प्रकार सिक्कों को भी स्मृति स्वरूप मानते हैं। इन सिक्कों से गुप्त शासकों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, धार्मिक विश्वासों और सांस्कृतिक गौरव का स्पष्ट संकेत मिलता है।
व्याख्यान के उपरांत प्रो. राजवन्त राव के निर्देशन में प्रतिभागियों को संग्रहालय की सात वीथिकाओं का शैक्षिक भ्रमण कराया गया। इस दौरान मथुरा और गांधार शैली की बौद्ध प्रतिमाओं के साथ-साथ जैन एवं वैष्णव प्रतिमाओं की जानकारी दी गई। प्रदर्शित उत्कृष्ट मृणमूर्तिकला ने प्रतिभागियों को प्राचीन शिल्प परंपरा से परिचित कराया।
कार्यशाला संयोजक डॉ. यशवन्त सिंह राठौर ने बताया कि कार्यशाला का अंतिम सप्तदिवसीय व्याख्यान 9 फरवरी 2026 को प्रातः 10 बजे यशोधरा सभागार में होगा। समापन एवं प्रमाण-पत्र वितरण कार्यक्रम पूर्वाह्न 11:30 बजे संपन्न होगा, जिसमें कुलपति प्रो. पूनम टंडन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगी।
अंत में विभागाध्यक्ष प्रो. प्रज्ञा चतुर्वेदी ने प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। छठे व्याख्यान दिवस में लगभग 74 प्रतिभागियों सहित संग्रहालय के कार्मिक भी उपस्थित रहे। यह आयोजन न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि स्मारक सिक्कों के माध्यम से प्राचीन भारत के इतिहास को समझने का सशक्त माध्यम भी बना।

Editor CP pandey

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