डिजिटल दुनिया में उलझा बचपन: मोबाइल ने दिया मनोरंजन, पर छीन ली मासूमियत

सोमनाथ मिश्रा की रिपोर्ट

आज का बच्चा खिलौनों, मैदानों और कहानियों की दुनिया से निकलकर मोबाइल और स्क्रीन की आभासी दुनिया में कैद होता जा रहा है। पहले जहाँ दादी-नानी की कहानियाँ, कबड्डी, लुका-छिपी और कंचे बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा थे, वहीं अब यूट्यूब, इंस्टाग्राम रील्स और ऑनलाइन गेम्स उनकी दुनिया बन चुके हैं। यह बदलाव केवल मनोरंजन की आदत नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया का बचपन पर असर गहराई से पड़ रहा है, जो बच्चों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की ध्यान शक्ति को कमजोर करता है। एक ही जगह बैठकर घंटों मोबाइल देखने से न केवल आंखों पर दबाव बढ़ता है, बल्कि दिमागी थकान, चिड़चिड़ापन और अनिद्रा जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। यह सोशल मीडिया का बचपन पर असर का एक गंभीर पहलू है, जिसे माता-पिता अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

सोशल मीडिया बच्चों को झूठी दुनिया दिखाता है, जहाँ हर चीज़ “परफेक्ट” नजर आती है। इससे बच्चों में हीन भावना विकसित होने लगती है। वे अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं और धीरे-धीरे असंतोष और अकेलापन उनके भीतर घर करने लगता है। कम उम्र में ही बच्चे लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स के पीछे भागने लगते हैं, जो उनके आत्मसम्मान को भी कमजोर करता है। यही सोशल मीडिया का बचपन पर असर का दूसरा बड़ा खतरा है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि मोबाइल ने बच्चों से उनकी मासूमियत छीन ली है। वे उम्र से पहले ही बड़े होने की कोशिश कर रहे हैं। अशोभनीय कंटेंट, हिंसक गेम्स और आभासी रिश्ते, उन्हें वास्तविक जीवन से दूर कर रहे हैं। दोस्ती अब मैदान में नहीं, चैट बॉक्स में हो रही है। भावनाएं इमोजी तक सिमट कर रह गई हैं।

हालांकि तकनीक पूरी तरह बुरी नहीं है, लेकिन उसका असंतुलित उपयोग बच्चों के भविष्य के लिए खतरा बन गया है। अभिभावकों की यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को डिजिटल अनुशासन सिखाएं। मोबाइल के लिए समय निर्धारित करें, आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें और परिवार के साथ समय बिताने की आदत विकसित करें।

यदि समय रहते इस सोशल मीडिया का बचपन पर असर को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक और सामाजिक रूप से कमजोर बन सकती है। जरूरी है कि बच्चों को फिर से किताबों, खेलों और प्रकृति से जोड़ा जाए, ताकि उनका बचपन केवल स्क्रीन में नहीं, बल्कि खुले आसमान के नीचे भी सांस ले सके।

rkpnews@somnath

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