शादी-ब्याह, जुलूस और सामाजिक आयोजनों में तेज डीजे अब “ट्रेंड” बन चुका है। देर रात तक गूंजती हाई बास और म्यूज़िक भले ही कुछ समय के लिए उत्साह पैदा करें, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह बढ़ता ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) समाज के हर आयु वर्ग के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा असर
चिकित्सकों का कहना है कि लगातार उच्च डेसिबल ध्वनि सुनने से:
• बच्चों की सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है
• कान बजना (Tinnitus) जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है
• बुजुर्गों में श्रवण संबंधी परेशानी बढ़ सकती है
• गर्भवती महिलाओं और हृदय रोगियों के लिए जोखिम बढ़ता है
विशेषज्ञों के अनुसार तेज ध्वनि से हृदय गति असंतुलित, रक्तचाप बढ़ना और तनाव स्तर में वृद्धि जैसी समस्याएँ भी सामने आती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर
केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य पर भी डीजे की तेज आवाज का प्रभाव देखा गया है:
• अनिद्रा
• चिड़चिड़ापन
• एकाग्रता में कमी
• लगातार तनाव
कई घटनाओं में भीड़ और अत्यधिक ध्वनि के संयुक्त प्रभाव से युवाओं के अचानक गिरने की खबरें भी सामने आई हैं। यह संकेत है कि ध्वनि प्रदूषण केवल “शोर” नहीं, बल्कि गंभीर स्वास्थ्य संकट बन सकता है।
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बंद स्थानों में और अधिक खतरा
क्लब, पब और सिनेमा हॉल जैसे बंद स्थानों में ध्वनि का प्रभाव और तीव्र हो जाता है। सीमित जगह में उच्च डेसिबल ध्वनि सीधे कानों और तंत्रिका तंत्र पर असर डालती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि मनोरंजन का उद्देश्य आनंद और विश्राम है, न कि स्वास्थ्य पर बोझ डालना।
प्रशासन से सख्ती की मांग
Central Pollution Control Board द्वारा निर्धारित डेसिबल सीमा के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है। ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
जागरूकता अभियान चलाकर आयोजकों और आम नागरिकों को बताया जाना चाहिए कि तेज ध्वनि केवल उत्सव का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए खतरा भी हो सकती है।
संतुलन ही समाधान
उत्सव मनाना सभी का अधिकार है, लेकिन दूसरों की शांति और स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। मध्यम ध्वनि में भी उत्सव का आनंद लिया जा सकता है — यही एक स्वस्थ और जिम्मेदार समाज की पहचान है।
