भक्ति पथ में जाति वर्ग बाधक नहीं

सिकन्दरपुर /बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। क्षेत्र के ड्हा स्थित वनखण्डी नाथ मठ परिसर में आयोजित ऐतिहासिक अद्वैत शिवशक्ति राजसूय महायज्ञ निर्बाध रूप से जारी है।यज्ञ के दैरान सुबह से शाम तक बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का हाजिरी देने का क्रम जारी है।उधर रात में चल रहे प्रवचन में भी काफी भीड़ हो रही है। इसी क्रम में रविवार को व्यासपीठ से अपने प्रवचन में गोरक्षपीठ गोरखपुर से पधारे स्वामी रामदास जी महाराज ने अपने प्रवचन में सन्त चरणामृत के महत्व पर सारगर्भित प्रकाश डाला।बताया कि भक्ति पथ में जाति वर्ग बाधक नहीं ,विषय विमोहित व्यक्ति भक्ति नहीं कर सकता,इस के लिये त्याग आवश्यक है।कहा कि द्वारिका से सात माह बाद लौटे अर्जुन ने युधिष्ठिर से कहा,भैया-अब हम लोग कृष्ण कृपा से वंचित हो गए क्योंकि वे परमधाम चले गए।लीला का संवरण सुन कुन्ती मैया ने कृष्ण कृष्ण कहते कहते शरीर त्याग दी।परीक्षित को राज्य भर सौंप कर पांडव भी परलोक चले गए।परीक्षित एक दिन गो रक्षार्थ कदम बढ़ाए ही थे कि आवाज आई -“मैं कलियुग हूँ,मेरे लिए स्थान बताएं”।राजा ने उसे मदिरालय,बधशाला आदि स्थान बताया।।किन्तु उसके आग्रह पर स्वर्ग में भी स्थान दे दिया। कथा को गति देते हुए वक्त ने कहा कि एक दिन परीक्षित अपने पूर्वजों द्वारा प्राप्त जरासंघ के स्वर्ण मुकुट पहन कर आखेट हेतु वन में गए।प्यास लगी तो शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे।ऋषि ध्यानवस्थ थे।कलि के प्रभाव से ऋषि को ढोंगी समझ राजा ने उनके गले में मृत सर्प लपेट दिया।तब ऋषि पुत्र ने समाचार पा कर शाप दे डाला कि जिस ने यह दुष्कर्म किया है,आज के सातवें दिन इसी सर्प के काटने से मर जायेगा।परीक्षित चिंतातुर हो शुकदेव स्वामी के शरण में गए।वे गंगा तट पर बट बृक्ष की छाया विराजमान थे।वह स्थान आज ‘शुक्रताल’के नाम से जाना जाता है।निश्चय ही अन्योपार्जित धन विनाश का कारण है।शापित परीक्षित को नींद भी नहीं आ रही थी। शुकदेव जी बोले,मृत्यु तो सब की होनी है किंतु उस की भयंकरता से बचने के लिए भगवत कथा का श्रवण चिंतन अनिवार्य है।प्राणायाम करो ,जितेन्द्रिय रहो, श्री हरि के चरण कमलों का ध्यान करो, भगवत कृपा के बिना कुछ भी सम्भव नहीं।हरि नाम जे बिना जीवन व्यर्थ है।हरि नाम अमृत से भी बढ़ कर है।हरि नाम की महिमा अपार है।जिसका वर्णन स्वयं भगवान भी नहीं कर पाते।”कहा कि प्रेमहीन दुर्योधन के छप्पन भोग प्रभु को प्रिय नहीं,उन्हें तो भक्त विदुर केले के छिलके ही भाते हैं।सबरी के पूर्व जन्म की कथा को बाद के जन्म की कथा से जोड़ते हुए वक्ता ने कहा कि भक्ति का प्रभाव ही है कि मुनि मन्त्रा से शिष्यत्व प्राप्त कर उस ने श्री राम का दर्शन किया।सच्चे प्रेम में स्वार्थ के लिए कोई स्थान नहीं।

Karan Pandey

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