महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। किसानों के लिए सिंचाई का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। फसलें पानी की हर बूंद पर निर्भर करती हैं और नहरें ग्रामीण कृषि व्यवस्था की जीवन रेखा मानी जाती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जब नहरों से पानी बहना चाहिए, ठीक उसी समय सफाई का ढोल पीट दिया जाता है। यह व्यवस्था की वह खामोशी है जो किसानों के पसीने पर भारी पड़ती है। नहर की सफाई निश्चित रूप से आवश्यक है, पर सवाल यह है कि यह काम सिंचाई सीजन के ठीक बीच में ही क्यों याद आता है? जब खेतों को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तभी नहरों का बहाव रोक देना किसानों की नियति के साथ खिलवाड़ है। कई स्थानों पर देखा गया है कि सफाई के नाम पर नहरें बंद कर दी जाती हैं, मिट्टी निकासी आधी-अधूरी रहती है और सफाई पूरी होने तक फसलें प्यास से तड़पती रहती हैं।
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किसान शिकायत करते हैं कि अधिकारी जमीन पर नहीं उतरते, केवल कागजों पर योजनाएं बनती रहती हैं। सफाई के नाम पर जिस सिस्टम को पारदर्शी और समयबद्ध होना चाहिए, वही सबसे अधिक लापरवाह प्रतीत होता है। नतीजा यह होता है कि फसलों की बढ़वार रुक जाती है, पैदावार पर असर पड़ता है और फिर उसी किसान को बाजार में कम दाम का बोझ भी झेलना पड़ता है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध समय प्रबंधन की असफलता है। किसी भी सिंचाई विभाग को पता होता है कि कब रबी-सिंचाई की मांग बढ़ेगी, कब खरीफ की फसल को पानी चाहिए। इसके बावजूद सफाई का काम उसी समय शुरू करना समझ से परे है। यदि यही कार्य सिंचाई सीजन से पहले किया जाए, तो न केवल किसानों को राहत मिलेगी बल्कि नहरों की उपयोगिता भी अधिक बढ़ेगी। सरकार चाहे जितनी योजनाएं घोषित करे, पर धरातल पर उनका अमल तभी सफल माना जाएगा जब किसान की तकलीफ कम हो, उसकी फसल सुरक्षित रहे और उसका श्रम सम्मान पाए। नहर सफाई जैसे तकनीकी कार्यों में समय की प्राथमिकता को समझना सबसे जरूरी है।
किसानों की मांग सीधी और स्पष्ट है, सफाई हो,पर समय पर हो, नहर बंद हो, पर फसल को नुकसान न पहुंचे। प्रशासन के लिए यह चेतावनी है कि यदि कृषि व्यवस्था के मूल तत्व—पानी, नहरें और सिंचाई—का प्रबंधन सही न रहा, तो किसानों का भरोसा तंत्र से उठ जाएगा। और जब किसान ही निराश हो जाए, तो किसी भी अर्थव्यवस्था की नींव डगमगाना तय है।
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