बलिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। आधुनिक समय में मनुष्य जितनी तेजी से प्रगति कर रहा है, उतनी ही तेजी से उसके रिश्ते कमजोर होते दिखाई दे रहे हैं। संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बंटते जा रहे हैं। माता-पिता बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा और जीवन निर्माण के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं, लेकिन बदले में वही भावनात्मक निकटता और सम्मान अक्सर देखने को नहीं मिलता।
एक समय था जब परिवार सिर्फ साथ रहने की जगह नहीं, बल्कि संस्कार, अपनापन और सुरक्षा का केंद्र होता था। कहा जाता है—
“पिता जैसा कोई सलाहकार नहीं, मां का आंचल सबसे बड़ी दुनिया है, भाई सर्वोत्तम साथी और बहन सच्ची शुभचिंतक होती है।”
यह पंक्तियाँ उस दौर की याद दिलाती हैं, जब रिश्ते निभाए जाते थे, निभाने का दिखावा नहीं किया जाता था।
लेकिन आज के भौतिकवादी दौर में पारिवारिक संरचना तेजी से बदल रही है। लोग अपने-अपने जीवन में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि परिवार की गर्माहट और रिश्तों की मिठास पीछे छूटती जा रही है। चाचा, मामा, मौसी जैसे रक्त संबंध भी अब बच्चों के जीवन से धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। मोहल्ले तक के बच्चे एक-दूसरे से अनजान हो चुके हैं।
पहले कहा जाता था—“घर छोटा हो, लेकिन परिवार बड़ा।” संयुक्त परिवार में बच्चों को सुरक्षा, संस्कार और सांस्कृतिक धरोहर मिलती थी। परंतु आज निजता (Privacy) ने व्यक्ति को अपनों से दूर कर दिया है। यही कारण है कि सामाजिक ताना-बाना कमजोर पड़ता जा रहा है।
आज समय की मांग है कि लोग अपने दिल-दिमाग के दरवाजे खोलें, परिवार के महत्व को समझें और रिश्तों को फिर से जीवंत बनाएं। यदि हम परिवार, पड़ोस और गांव को फिर से एक सूत्र में पिरो सकें, तो रिश्तों की खोई मिठास अवश्य लौट सकती है।
— सीमा त्रिपाठी
शिक्षिका एवं साहित्यकार
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